बुधवार, 28 जनवरी 2015

                                           आशियाना 

                                                    इंदुमती का दसवां पन्ना 


अब वक़्त आ गया था ठौर ठिकाना बदलने का फिर कुछ छूटेगा और शायद कुछ टूटे भी ठिकाने बदलते वक़्त अक्सर कुछ ना कुछ छूटता है या टूटता है, मै चाहता था ठिकाना भी बदल जाय और कुछ टूटे भी ना ही ना हि कुछ छूटे, पर करता भी क्या उपाध्याय जैसा खाँटी इलाहाबादी तो छूट ही रहा था, उपाध्याय का बाटीचोखा, वो पुरबिया भौकाल, कोहबर की शर्त की कहानी ये सब भी मेरा हिस्सा था, इंदुमती के साथ यूँ ही लॉज छोड़ देना मेरे लिए आसान नही था उपाध्याय के बकैती की जैसे आदत थी, कई बार सोचता की क्या उपाध्याय जैसा कोई पड़ोसी होगा जो मुझे बिना पूंछे खाना ना खाये, पर अब फैसले पर अंतिम मोहर लग चुकी थी जाना तय था, उपाध्याय के साल भर के दाना पानी पर किसी चार पराठे भारी हो रहे थे, डॉ साब को भी बताना था और इस महीने का किराया भी तो देना था,
अगली सुबह डॉ साब के घर पहुँच गया वो लॉज मे ही ग्राउंडफ्लोर मे रहते थे, हड़िया के पास किसी गाँव मे उनका अपना अस्पताल था, तो अक्सर सबेरे जल्दी ही निकल जाते थे तो जब भी उनसे मिलना हो तो सबेरे जल्दी ही जाना पड़ता था महीने की हर छःतारीख को डॉ साब मुलाक़ात होती थी मेरा किराया देने का दिन था एक बार जब मै छःतारीख को डॉ साब से मिला तो अगली सुबह डॉ साब खुद मेरे पास आकार बोले अमित कैसे हो कोई परेशानी हो तो बता देना पैसों की जरूरत तो नही है, मै समझ सकता था हर महीने छः तारीख को किराया देता था इस बार नही दे पाया तो शायद डॉ साब को लगा हो की मेरे पास पैसे नही है, मै बोला नही सर अभी है एक दो दिन मे घर जाऊंगा तो...
ये सब छूटने वाला था क्या कोई ऐसा ही आगे भी मिलने वाला है जो किराया न मिलने पर खुद पैसे देने आ जाए खैर जो भी हो अब जाना तो है ही या अगर यहीं रहना है तो इंदुमती का मेरे कमरे मे आना नही होगा जो अब मेरे लिए मुश्किल हो रहा था, डॉ साब अखबार के साथ उलझे हुये थे मेरी तरफ देख बोले आओ अमित कैसे हो कहकर फिर पेपर मे उलझ गए और वही टीवी देखने लगा एक बाबा न्यूज चैनल मे भविष्य बता रहे थे, इतने मे ही डॉ साब की बिटिया गुनगुन आयी और अपने पापा को साथ ले गयी शायद उसकी मम्मी ने किसी काम से बुलाया होगा ,डॉ साब अंदर गए तो गुनगुन की माँ उनसे बोल रही थी की इस लड़के से बोल दो की कमरा खाली कर दे या वो लड़की जो मित्तल साब के यहाँ रहती है उसका आना जाना बंद कराये ये सब नही चलेगा ये सब बात आज कर ही लीजिये , उस लड़की चाल चरित्र मुझे ठीक नही लगता ये पूरी बात मै साफ सुन रहा था डॉ साब बोल रहे थे धीरे बोलो वो बाहर ही बैठा है सुनेगा तो क्या कहेगा, कहना क्या उसे भी तो पता चलना चाहिए ना गुनगुन की माँ बोली डॉ साब बोले ठीक है एक चाय उसके लिए भी भेज दो मै बात करता हूँ सब ठीक हो जाएगा , डॉ साब बाहर आकर मेरे पास ही बैठ गए और बोले अमित कैसी चल रही है पढ़ाई और गाँव कब से नही गए , मै बोला सर अभी गया था जल्दी मे ही और पैसे निकाल कर डॉ साब को देते हुये बोला सर ये मेरा किराया है मै कल खाली कर रहा हूँ । डॉ साब ने कोई सवाल नही किया बस शर्म निराशा जैसे भाव जरूर उस वक़्त उनके चेहरे पर थे । तब तक मेरे लिए चाय आ गयी थी जिसे मै बिना पिये ही ऊपर अपने रूम मे चला गया ।
अब उपाध्याय से बताना था जाने के लिए पर जैसे एक डर हो मन मे सामना करने का साहस ही नही था कैसे बोलूँ की अब जा रहा हूँ और क्यो जा रहा हूँ, इसका तो जवाब सही से मेरे पास भी नही था और जो जवाब था वो उपाध्याय भी जानता था पर उसे लगता था इतनी मामूली बात के लिए भला कोई कमरा बदलता है, खैर अब जो भी हो, जाना तो था ही, उपाध्याय से बात करने के लिए उसी के कमरे मे चला गया, का होई रहा है पूरब के बेटा भइया आज खाना वाना न खियाबों का मे मै बोला, उपाध्याय को शायद मेरे जाने की खबर पहले ही थी तभी उपाध्याय बोला हाँ हम चूतिया जो है ससुरे रोज बनाई खियाई और तुम हमसे कुछ पुछ्बो भी नै करो केत्ती देर जाना है, की जब समान लदवाने का टाइम होइएगा तभी बताओगे ससुरे बड़के हरामी हो साल भर हो गया साथ रहते अब जाने के टाइम बताय भी नही रहे हो,उपाध्याय बराबर बोले जा रहा था और मै कुछ कह नही पा रहा था जैसे कोई गुनाह हो गया हो, और उसकी सज़ा सुन रहा हूँ , उपाध्याय का लेक्चर बंद होने वाला नही था तो उपाध्याय को लेकर चौराहे आ गए चाय पीते पीते ही मैंने कहा आज शाम ही खाली करना है कोई ट्राली मंगा लेंगे उसी मे समान रखा कर यहाँ शिफ्ट हो जाते और कौन सा दूर है मे सबेरे शाम आ कर खाना तुमहरे साथय खाएँगे ।
शाम को उपाध्याय ट्राली ले आया और सारा समान, समान क्या तीन बोरी किताबें एक सुटकेश मेज कुर्सी फोल्डिंग बिस्तर गैस सिलेन्डर खाने का कुछ समान एक बोरी मे रखा कर अपने नये कमरे मे जिसके मालिक मिस्टर डिक्रूज थे के यहाँ रख दिया , फिर वापस आकर उपाध्याय के साथ उस रात देर तक टहलते रहे और मटियारा रोड मे ही बाटी चोखा खा कर आ गए अब अगले दिन इंदुमती का समान रखना था। वो भी उपाध्याय ने करा दिया
अब अपने सपनों के साथ हम नये आशियाने मे पहुँच गए थे, हम साथ बस ये नही पता था की ये साथ कितना दूर तक साथ रहेगा, उसी बीच अपने धर्मवीर भारती फैंस क्लब के एक सदस्य की एक लघु कथा इलाहाबाद के एक लोकल अखबार मे छपी और हम अपने को धर्मवीर भारती समझने लगे, और बस किताबों मे उलझ गये इंदुमती ने समझाया भी पर बात समझ नही आई, धर्मवीर भारती फैंस क्लब की बैठक भी अब नियमित हो रहीं थी । एक दिन बैठक के बाद मै और आशीष गंगा किनारे छोटी गोल्ड सुलगा रहे थे तब आशीष ने मुझसे कहा तुम बहुत जल्दी कर रहे हो कुछ चीजों का सही वक़्त मे ना होना जीवन को बदल देता है , मै कुछ समझा नही भाई किस बात के लिए बोल रहे हो , मै बोला आशीष कहने लगा मै उस लड़की की बात कर रहा हूँ जिसके लिए तुमने रूम बदल लिया और अब उसी के साथ रह रहे हो ,मै बोला भाई जी आप जैसा समझ रहे हो वैसा कुछ है नही और वो मेरी एक दोस्त है जैसे आप , हम एक रूम मे नही एक लॉज अलग अलग कमरों के किरायेदार है, और इस बात के बाद मै शिवकुटी से वापस आ गया हर बार की तरह रुका नही और ना ही आशीष ने रोका इसका ये तो मतलब था की वो भी मेरे रूम बदलने से खुश नही था , वापस आने पर इंदुमती ने पुंछा क्या बात है कल आने वाले थे , नहीं मन नही लगा तो चला आया , तो इंदुमती बोली की मै अभी पढ रही हूँ अगर खाना हो तो बता देना सब्जी रखी है रोटियाँ मै बना दूँगी ,मै बिना कोई जवाब दिये अपने रूम मे आ गया पिछले एक हफ्ते से जब से इस रूम मे आया था तो एक या दो दिन ही मेरे रूम मे खाना बना था वो इंदुमती ने ही बनाया था , रोज का खाना इंदुमती के यहाँ ही होता था , उस दिन रूम मे आने के बाद मैंने तहरी बनाई और खा कर किताब ले कर बैठ गया , मै जब खाने के लिए इंदुमती के पास नही गया तो वो कु छ देर बाद पूछने आई मैंने कहा खा लिया है तहरी बनाई रखी है तुम ले जाओ तुम भी खा लेना, इंदुमती बिना बोले ही अपने रूम मे चली गयी , तब मुझे लग रहा था की इतने सारे लोग गलत नही हो सकते मुझे रूम नही बदलना चाहिए था मेरे और इंदुमती के बीच जुडने से पहले कुछ टूटने की वो पहली आहाट थी जिसे मै उस वक़्त समझ नही पाया था , उस दिन के बाद कई दिनों तक हम दोनों ही अलग अलग खाना बनाते रहे कितने दिन ये ठीक से याद नही है , काफी दिनो बाद जब सिनेमा देखने गए तब कुछ समान्य हुआ, अब इंदुमती भी शाकाहारी हो चुकी थी घर मे तो अंडा बंद हो ही गया था बाहर भी नही खाती थी उस दिन सिनेमा मे जब मै बोला की आमलेट ले आऊ तो उसने कहा वो लाना जो तुम खा सकते हो साथ है तो साथ मे खायेगे इस एक बात ने सारी बातों को पीछे छोड़ दिया लग रहा था अभी इंदुमती को गोद मे उठा लूँ, सिनेमा चल रहा था मै इंदुमती के साथ बैठ गया था और अब इंदुमती अपने उछलते हुए दिल और जैसे किसी शोर से लाल कान और कुछ ज्यादा सजग हो रही थी , मै भी तन कर बैठा हुआ था सिनेमा मे उसी क्रम का विकास चल रहा था इमरान हाशमी जिसके परिपक्व रूप है, जब चुंबन लंबा खिंच गया । तब मुझे पता चला की शर्म से गाल लाल होना तो किताबी बात है । लाल तो कान होते है इंदुमती के कान लाल हो रहे थे, साथ ही तापमान भी बढ़ता ही जा रहा था । अपनी भी एक आँख सिनेमा मे तो एक आँख इंदुमती मे तब महसूस किया इंदुमती भी मेरी तरफ देख रही थी, मै उसकी नाक से निकलती ज़ोर ज़ोर हवा को सुन सकता था । और किसी हल्की सी गलती किसी अनियमितता का इंतज़ार कर रहा जो शायद दोनों के मन मे उमड़ रहे ख्यालों को ज़ाहिर कर देती। नाक से निकलती हवाओं की नज़दीकयां उसके गले के नर्म घ्ंघ्रले बालों को महसूस करना कैसा होगा......??
कुछ देर बाद जब मै जब अपनी सीट से हिला, और कुछ तनाव भरी आवाज़ मे इंदुमती से खाने के लिए पुंछने लगा खाने के लिए कहाँ चलना है । तब वो हंस पड़ी और बोली मुझे लगता है आज तुम घर मे ही खाना पसंद करोगे...............

क्रमश.....

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

                                                                         

                                                                       चाचा नेहरू 


एक चचा जिससे आपका कोई रिश्ता नही ना जाति का धर्म का फिर भी सबके प्यारे चाचा एसे चचा होते है सबके गली मोहल्लों मे शायद आप सबके भी मुहल्ले मे कोई ऐसा चेहरा रहा हो , मेरे गाँव मे भी थे मुन्ना चाचा मेरे जैसे तमाम बच्चों को प्यारे थे बड़ों के बीच वो क्या थे कैसे थे इससे किसी को कोई मतलब नही बस वो बच्चों से प्यार करते थे उनसे हंस कर बात करे कभी टॉफी चॉकलेट खिलते यही सब काफी था मुहल्ले के एक मुन्ना को बच्चों का मुन्ना चाचा बनाने के लिए, एक चीज इन चचा लोगो समान है ये ज़्यादातर लिबरल (उदार) होते है, मै मुन्ना चाचा की कोई कहानी नही सुना रहा हूँ, मेरा मानना ये है की बच्चों का चाचा बनना आसान नही है, तो नेहरू की बहुत सी उपलब्धियों से अलग ये एक असाधारण बात ही है की वो बहुत से बच्चों के चाचा थे और बच्चों को उनमे विश्वास,

आज़ाद भारत का प्रधानमंत्री नेहरू को बनना ही था, गांधी के सपनों का भारत जो बनाना था और नेहरू ने उसकी नीव रखी भी हिंदुस्तान को हिंदुस्थान बनने से रोका अगर उस वक़्त गलती से भी सत्ता संघ जैसी की ताकत के हांथ मे जाती तो देश आज पाकिस्तान की तरह अपनी ही आग मे झुलस रहा होता आज वामपंथी कलमे अगर चल रही है तो वो गांधी और नेहरू के ही सेक्युलर सोच का नतीजा है मुझे पता है आज जो सरकार है उसमे नेहरू और उनके विचार प्रासंगिक नही है पर आजादी के बाद अब तक की हर सरकार ने नेहरू की विरासत को बढ़ाने का काम किया है चाहे वो मण्डल के मशीहा वीपी सिंह रहे हो या जनसंघ के बाजपेयी

नेहरू को अनदेखा करने के लिए आजकल कुछ दक्षिणपंथी पटेल और नेहरू को आमने सामने रख कर पटेल के नाम का लोहा जोड़ रहे है, उनका दावा है की नेहरू पटेल को हटा कर सत्ता मे आए थे, इसी का जिक्र करते हुये पटेल ने लिखा था, आज़ादी के समय मंत्री मण्डल स्वरूप मे चर्चा के समय, नेहरू ने पटेल को एक पत्र एक अगस्त १९४७ को लिखा जिसमे नेहरू कहते है " कुछ हद तक औपचरिकताये निभाना जरूरी होने से मै आपको मंत्री मण्डल मे समलित होने के लिए लिख रहा हूँ इस पत्र का कोई महत्व नही है क्यो की आप मंत्री मण्डल के सुदृढ़ स्तम्भ है, जवाब पटेल ने तीन अगस्त को लिखा "एक अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद । एक दूसरे के प्रति जो हमारा अनुराग व प्रेम रहा है तथा लगभग तीस वर्षों की हमारी अखंड मित्रता है । उसे देखते हुये औपचारिकता का कोई स्थान नही रह जाता । आशा है मेरी बाकी के जीवन की सेवाएँ आपके अधीन रहेंगी । आपको धेय की सिद्धि के लिए मेरी सम्पूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी । 
नेहरू की जगह पटेल को प्रधानमंत्री ना बनाने का जितना दुख दक्षिणपंथी और संघ के लोग जताते है , वैसा पटेल नही सोचते थे वो संघ नही गांधी के सपनों के भारत के हिमायती थे

उस वक़्त के आजाद देशों से भारत की तुलना करे तो समझ आएगा नेहरू का योगदान नेहरू राजनैतिक रूप से मुझे बामपंथी ही लगते रहे , जिस वक़्त नेहरू ने सत्ता संभाली देश का बटवारा धार्मिक रूप से हुआ था ऐसे मे लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को लागू करना इतना आसान नही नही था पर वो साहस नेहरू मे था और उन्होने कर दिखाया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अंबेडकर जैसे विचरवान लोगों को साथ लेकर संविधान सभा से संविधान लागू करने का सफर भी साहस भरा था
ऐसे थे चाचा नेहरू बच्चे सबकी मन की बात नही सुनते बच्चों तक पहुचने के लिए एक उदार चेहरे और चरित्र की जरूरत है । ये देश नेहरू के योगदान का ऋणी रहेगा

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

                                                                 प्रेमचंद की निर्मला

                                                               इंदुमती  का नौवां पन्ना 

बहुत कुछ बदल रहा था पसन्द नापसंद सब कुछ, अब मै उस दौर मे था जब आप अकेले मे भी बिना आईना देखकर हांथ अपने बालों पर घुमाते है और चेहरा किसी और का नज़र आता है, होता है शायद आपके साथ भी हुआ हो, अब नब्बे के दशक के उदितनारायन, कुमार सानू पसन्द आ रहे थे अकेले बैठे बैठे भी मुसकुराता रहता था, अपने कपड़ों और पहनावे को लेकर तब पहली बार गंभीर हुआ था उसके पहले तो स्लीपर और लोवर मे पूरा इलाहाबाद घूम लेता था कई बार सिनेमा देखने भी लोवर मे ही गया था, इतना कुछ बदल रहा था और मुझे पता नही चला, बस मै भी इन सब बदलावों के साथ बढ़ता जा रहा था जो भी था सब चरम मे था अब किसी का बस नही था उसमे मेरा भी नही अब उपाध्याय की कही बात का भी फर्क नही पड़ता, हाँ अब किताबों के साथ एफ़एम या साउंड धीरे धीरे चलता ही रहता था, किशोर के गाने भी गंभीर हो कर सुने जाते थे,
उस दिन जब ट्रेन चलने लगी तो इंदुमती ने एक प्लास्टिक का थैला पकड़ा दिया, अब ट्रेन चल रही थी तो मैंने ले लिया बिना कुछ पूंछे, पूंछने का कोई मतलब भी नही था जब पहले पूछा था तो बोली थी की कुछ किताबें है, और ड्रेस है जो सिविल लाइंस मे बदलनी है, अब तो समझ आ ही गया था की क्या है बस खोल कर देखने का इंतज़ार था, पर इस बार जितना सोचा था उपहार मे कुछ उससे अधिक ही था कमीज़ अमृता प्रीतम की एक किताब के साथ कार्ड और एक गुलाबी फूल बने कागज़ मे ख़त, अब ख़त को साझा करने का मन नही है, हाँ ख़त मे अमृता प्रीतम की किताब के लिए लिखा था की ये वो पहली कड़ी है जिसने मुझे तुमसे मिलाया ख़त के आख़िर मे एक लाइन थी
"कुछ माहौल जुदा था कुछ अहसास भी जुदा थे 
रुका था वक्त भी, जब तुम हमसे दूर जा रहे थे"
ट्रेन अपनी रफ्तार से बढ़ रही थी महानगरी का इलाहाबाद के बाद अगला स्टोपेज मानिकपुर है पर आम तौर पर ये इलाहाबाद मानिकपुर के बीच कई बार रुकती है पर उस दिन शायद वो भी जल्दी मे थी ढाई घंटे के उस सफर मे ना जाने कितनी बार मैंने उस ख़त को पढ़ा, मानिकपुर स्टेशन मे विवेक पहले से ही मेरा इंतजार कर रहा था विवेक मेरा स्कूल के दिनों का साथी था उसके साथ मै सीधे घर पहुंचा मम्मी पापा से मिला बस मन कहीं और था विवेक से भी ज्यादा बात नही कर पा रहा था , विवेक कुछ लप्पू झन्ना टाइप का था जो छीछा लेदर ज्यादा करते है मम्मी खाना दे रहीं थी तभी वो मम्मी से बोला चाची अब इसकी शादी की कुछ सोचो, वो जितना सरलता से ये बात बोल गया मम्मी उतनी ही गंभीर थी इस विषय को लेकर बस पापा थे जो टालते जा रहे थे और पापा ने वही बात शुरू की हमेशा मेरे आने पर होती थी इस बार पापा जी कुछ कड़ाई के साथ बोल रहे थे की तुम करना क्या चाहते हो जिस तरह तुम्हारी पढ़ाई चल रही है मुझे नही लगता की तुम सीपीएमटी निकाल पाओगे बीएमएलटी क्यो नही कर लेते मै बिना कुछ बोले खाना खा रहा था पापा बोले प्रेमचंद पढ़ कर कोई सीपीएमटी का एक्जाम निकाल पाया है तुम सिर्फ वक़्त बरबाद कर रहे हो "तब कुछ बोला नहीं पर कई बार सोचता हूँ की शायद पापा सही थे" पापा अभी कुछ दिन और इलाहाबाद मे हूँ फिर देखता हूँ कह कर खाने की मेज से चुपचाप निकल लिया,

कब जाना है इलाहाबाद मम्मी ने पुंछा, कल सुबह ही निकलूँगा कोचिंग जाना है कह कर विवेक के साथ बाहर निकाल आया और विवेक को गरियाना शुरू कर दिया,विवेक बोला तो बोला भइया का गलत बोले है हम सब समझ गए है कुछ तो गड़बड़ है पहले तो तुम शाम को आए हमे कोई भाव नही दे रहे हो ऊपर से सुबह की गाड़ी से जा भी रहे ई सब का माजरा है । अब बोलो सच बताना कुछ तो है ना, अच्छा नाम तो बता दो कौन है , नही बे कुछ नही है बस मन नही है और कोचिंग भी है तभी जाना पड़ रहा है, ठीक है भाई न बताओ मुझे आना है इलाहाबाद तो सब समझ लूँगा एक दो दिल रुकूँगा भी तुम्हारे पास, विवेक की सिनेमा वाली आदत बहुत खराब थी दिन मे तीन तीन सिनेमा देख लेता था इसी लिए मै उसके साथ नही जा पाता था, विवेक सिगरेट नही पिलाओगे का बे बस बकैती पेल रहे हो ले कर आया हूँ भाई पर पियेंगे कहाँ चल स्टेशन चलते उधर ही कहीं स्टेशन पहुँच कर मैंने सुबह की ट्रेन का पता किया फिर आगे तालाब के पास जा कर दोनों एक ही सिगरेट मे सुट्टा लगाते रहे, मै था तो विवेक के साथ पर अपने को बिलकुल अकेला महसूश का रहा था विवेक को उसके घर छोड़ कर एक बार फिर तालाब के किनारे बैठा रहा जाने कब ये अकेलापन मुझे अच्छा लगने लगा,

रात भर ठीक से सो नही पाया सुबह चार बजे ही स्टेशन पुहुंच गया, उस दिन स्टेशन आम दिनों से ज्यादा ही साफ था कुछ यात्री प्लेटफॉर्म मे सो रहे थे जैसे वो स्टेशन सिर्फ सोने के लिए आए हों मानिकपुर स्टेशन मे बहुत से ऐसे ही रहते है जो सोने ही आते है स्टेशन मे वो अलग अलग तरह के काम करने वाले होते है कुछ ट्रेन मे समान बेचने वाले कुछ समान निकालने वाले कुछ सफाई वाले और इनकी सुरक्षा के लिए पुलिस थाना भी स्टेशन मे है , स्टेशन के होर्डिंग नए हो रहे थे अब मानिकपुर मे भी अँग्रेजी सीखने वाले आ गए थे ये अलग बात थी वो अपनी दुकान मानिकपुर मे खोल नही पाये पर होर्डिंग्स जरूर लटका गए थे, आज ट्रेन का इंतज़ार परेशान कर रहा था और एक वक़्त था जब मै सोचता था ट्रेन छूट जाये और एक दिन घर मे रुक जाऊँ, एक लंबे इंतज़ार के बाद दादर गोरखपुर एक्स्प्रेस प्लेटफॉर्म पर आ गयी मानिकपुर के कुछ उँगलियों मे गिनती भर कुली ट्रेन की तरफ दौड़े इन तमाम दौड़ते भागते लोगों के बीच मै भी अपने लिए खिड़की के पास वाली एक सीट ढूंढ ली, ट्रेन 

अब मुझे लेकर दौड़ रही थी शायद उसे भी इलाहाबाद का इंतज़ार था,
इलाहाबाद है ही ऐसा शहर की बस मोहब्बत हो ही जाती है, पुरबिया बोली अवध की तहज़ीब कुछ बुंदेलों की गर्मी सब तो था इलाहाबाद मे चौड़ी सड़के जिन्हे देख कर लगता था की आप लखनऊ मे है, पतली गलियाँ जो इलाहाबाद मे होते आपको बनारस का एहसास करा जाती थी सुबह धुंध भरी हल्की ठंढक के साथ दोपहर मे तपती धूप तो शाम अक्षत यवोना की तरह सामने होती थी, बस एक अनोखे मिज़ाज वाला शहर है इलाहाबाद , गाड़ी इलाहाबाद गऊघाट पुल मे आयी तो मै जैसे नींद से जागा और अपना बैग कंधे पर डाल कर गेट के पास खड़ा हो गया, स्टेशन मे मुझे कोई लेने नही आने वाला था न ही कभी कोई आया था पर इस बार शायद किसी को तलाश कर रहा था,
कमरे का दरवाजा खोल ही रहा था की शुभचिंतक उपाध्याय आ गए जन्मदिवस की बधाई देने लगे और बोले की बहुत बड़े वालों हो मे कल बताया भी नही और निकल लिए चलो आज खाना मेरे साथ ही खा लेना पर शाम को कुछ प्रोग्राम बना लेना बेटा सस्ते मे नही निपटोगे, की चेतावनी के साथ बड़े भइया गये।

शाम को कोचिंग के बाद चौराहे पर चाय पी रहा था सुबह से अब तक कई जगह कमरे की तलाश कर चुका था पर कुछ ठीक समझ नही आया था, तब तक इंदुमती भी आ गयी थी, कब आए हो घर से, इंदुमती ने पुछा सबेरे ही आ गया था भइया एक चाय और दे दो चाय पीते ही मैंने उसे बताया की आज कई जगह कमरे के लिए गया पर कुछ समझ नही आया कटरा मे तो मिल रहा था पर दूर बहुत है, हम समान बदलने के झंझट से बचने के लिए पास मे ही चाहते थे, इंदुमती बोली चलो कोई नही एक दो दिन मे देख लेना कहीं न कहीं मिल ही जाएगा पास रहेगा तो बेहतर ही है, चाय खत्म करके हम किताबों की दुकान मे खड़े थे, कमरे को ले कर बात हो ही रही थी तो मैंने दुकान वाले से पुछा गुरु कोई कमरा तो नही मिल जायेगा यहीं कहीं आस पास दो चाहिये एक ही जगह हम दोनों को चाहिये, दुकान वाला बोला मिल तो जायेगा पर चार पाँच दिन लगेंगे दुकान के ऊपर वाले ही है एक तो खाली है एक खाली होना है जिस दिन हो जाएगा आ जाइए मै आज किराए की बात कर लेता हूँ , आप कल आ जाये बात करा देता हूँ ,

हम वापस अपने लॉज आने लगे इंदुमती बोली रात का खाना बनाओगे या मै ले कर आ जाऊँ नही आज उपाध्याय के साथ खाना है , खाना क्या है उसे लेकर कहीं बाहर जाना है खाने, चलते चलते मैंने इंदुमती से कहा जब तक कमरा बदलते नही है तब तक इस बारे मे किसी से कोई बात ना करना मित्तल साब को तो बता ही दिया होगा, मै कल डॉ साब को बोल दूंगा, इंदुमती बोली तो मेरे साथ कब चलोगे, मै बोला कहाँ चलना है, अभी बर्थडे तो हमने मनाया ही नही और आज तो कुछ ठीक से बात भी नही हो पायी इंदुमती बोली, हो जाएगी वो भी हो जाएगी और मै क्या बताऊंगा राजकुमारी जो बोलेंगी वही होगा तो कल सुबह मिलना फिर बात करते है , अब चलता हूँ उपाध्याय बैठा होगा उसे लेकर जाना है
उपाध्याय रुद्राक्ष की माला और अपनी कुछ पत्थरो वाली अंगूठियाँ उतार कर तैयार थे, चलबों गुरु हाँ भाई चलने के लिए ही तो इंतजार कर रहे थे, मै बोला ई सब का है मे ई माला अंगूठी काहे उतार दिया, अब आज अंडा खाना है तो ई सब थोड़े पहिनेगे उपाध्याय बोला, तुमसे किसने कहा की अंडा खाना है मै तो नही खाता अंडे उपाध्याय ज़ोर से हँसा और कहा अब हमसे ई पंडिताई ना पेलो हम देखे है तुम्हें अंडे की दुकान मे कई बार ऊ मैडम के साथ अब हमहिन मिले है चूतिया बानवेन का , मै उपाध्याय को समझाता रहा की मै नही खाता वो राधा खाती है तो उसी के साथ दुकान मे देखा हो पर वो विश्वास करने के पक्ष मे था ही नही और वो कभी नही माना उसे हमेशा लगता था की मै चुरा कर अंडे खाता हूँ उपाध्याय की पसंद के हिसाब स उस दिन पीएचक्यू के पास एक ढाबे मे खाना खाया उपाध्याय वहाँ भी नाराज़ हुआ जब मै अंडा की जगह अपने लिए कोफ़्ता मंगा लिया खाने के बाद उपाध्याय जी ने प्रेमचंद की निर्मला उपहार मे दी निर्मला मुझे प्रेमचंद की रचनाओ मे सबसे ज्यादा पसंद थी

वापस आ कर कॉफी हाउस मे कॉफी और सिगरेट सुलगाई उपाध्याय थोड़ा गंभीरता के साथ वो लड़की भाई आपके कमरे मे आती है शायद डॉ साब और आंटी जी को ठीक नही लगता मुझसे कहा है की मै आपसे बात कर लूँ और लॉज मे कोई लड़की ना आए ये ध्यान रखे, मैंने कहा परेशान ना हो भाई कल मै बात कर लूँगा डॉ साब से और हो सकेगा तो रूम भी बदल लूँगा फिर हम अपने लॉज चले आए

अगली सुबह इंदुमती लॉज मे फिर आ गयी अब मै उसे मना भी नही कर सकता था, वो आते ही सिर हिला कर पुछा कैसे हो और आंखो और हांथ से इशारा करते हुये चाय के लिए पुछा तो नहीं मे सिर हिला दिया वो बिना कुछ बोले ही चाय का पानी गैस मे रख कर मिल्क पाउडर मिलाने लगी कुछ गुनगुना नही रही थी जब चाय ले आयी तो चाय पीते हुये मैंने पुछा - "तो राजकुमारी कहाँ चलना है कुछ सोचा नही इस बार तुम बताओगे बर्थड़े तुम्हारा था, मै चाय का कप मेज मे रखते हुये बोला मै तो चाहता हूँ की तुम यही रहो और ऐसे ही दिन भर चाय पीते है, इंदुमती ने मेरा सर अपनी गोद मे रख लिया और माथे को चूम कर बोली तो ठीक है खाना भी यहीं बना लूँगी पर कोचिंग तो जाना है ना, अरे राजकुमारी कोई नही फिर कभी अभी रूम तो बदल ले फिर तो रोज तुम्ही को बनाना है , इंदुमती ने मुझे उठा कर बैठा दिया और बोली तो ये बात है मै नही बनाने वाली रोज का खाना हाँ चाय मिल सकती है वो भी कभी कभी चलो ठीक है अभी तो बना लो, वो बोली हाँ वो किताब के दुकान वाले भइया मिले थे तो बोले है की तुम बात कर लो और कल से आ सकते है आप लोग आज वो दूसरा वाला रूम भी खाली हो जाएगा

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

                                                                        हैप्पी बर्थडे 

                                               इंदुमती  का आठवां पन्ना 


इंदुमती को घर के पास छोड़ा मित्तल साब अखबार वाले के पास खड़े कुछ बातें कर रहे थे मेरी मित्तल साब से कोई मुलाक़ात नही थी फिर भी मैंने औपचारिकता बस मित्तल साब से नमस्कार कर लिया और उनका जवाब भी ऐसा ही था जैसे वो अभिवादन का जवाब देना नही चाहते हों पर फिर भी ये दूसरी बार मै उन्हे नमस्कार ठोक रहा था इंदुमती सीधे गेट के अंदर चली गयी , इस बार पलटकर कुछ कहा नही और मै भी अपने लाज चला गया, अब दीपक भाई की थ्रीजी वापस करने जाना था, पहले लगा की नहा कर सो जाता हूँ, फिर मन मे आया की अभी वक़्त मे दे आता हूँ नही फिर दुबारा नही मिलेगी, तो बाघंबरी जाना ही ठीक था, सोमवार का दिन था, गुनगुन, सगुन को डॉ साब स्कूल छोडने के लिए बस का इंतज़ार कर रहे थे, सप्ताह का पहला दिन इतवार होता है पर जब कि हमे पाँचवी तक ये बात समझ नही आई , संडे मंडे पहली दूसरी मे ही सीख गए थे, हम हमेशा सोमवार को ही सप्ताह का पहला दिन मानते रहे इतवार की छुट्टी के बाद सोमवार को स्कूल जाना बिलकुल पसंद नही था, हाँ स्कूल पहुँचने के बाद ये नापसंदी हमेशा भूल जाती, स्कूली दोस्तो मे मस्त हो जाते, लंचबॉक्स लंचटाइम की मस्ती सब कुछ ऐसा था की याद आ जाये तो तमाम बड़ी बड़ी बातें बेकार लगती है, वक़्त है ही ऐसा जो हमेशा गुज़र जाने के बाद वापस नही आता।

बाघंबरी से दीपक भाई को हीरोपुक वापस करके अपनी साइकिल से वापस अल्लापुर दीपक भाई रोक रहे थे बोले भी की चलो कचौड़ी खाते है, दीपक भाई के पास जाना हो और बिना कुछ खाये पिये वापस आना ये भी एक उपलब्धि ही थी कुछ लोग इस बात पर गंभीरता से ध्यान रखते है की उनके पास आने वाला बिना कुछ खाये ना जाये , ये वही लोग है जो हम जैसे काहिलों को गालियां देते रहते है, इनकी चर्चा भी अक्सर इसी के आस पास घूमती रहती थी उसके यहाँ गए तो उसने ये खिलाया उसने वो नही खिलाया इलाहाबाद मे तमाम ऐसे लड़के थे खाने पीने को लेकर बहुत गम्भीर रहते थे कल खाने मे क्या बनाना है ये भी उनकी चिंता का विषय होता था, और मै खाना बनाने से बचने के लिए ऐसी मित्रता से बचने की कोशिश कभी नही करता था,

वापस लाज पहुँच कर सो गया पर उपाध्याय जैसे पड़ोसी के होते हुये ऐसा हो ये संभव भी नही था कुछ देर बाद उपाध्याय जी आ ही गए और मुझे इस तरह हिलाया की जैसे शहर मे आग लगी हो "उठो मे पूरी रात गायब रहो और दिन भर सोना ई सब का है मे इहाँ रात रात भर घूमय आए हो की पढ़य" मै उपाध्याय की चेरौरी करते हुये कहा भइया अभी सोने दो कुछ देर मे सब बताता हूँ, तुम का बताओगे हम सुबह तुम्हें मटियारारोड से आते देखा है । अब ई बताओ की इत्ते सबेरे कहाँ से आए गुरु वो भी उसके साथ,,,, हाँ भाई कुछ काम था सब समझ रहे है गुरु आज कल बहुत जरूरी जरूरी काम कर रहे हो उ भी पूरी पूरी रात इतना कह कर उपाध्याय कुटिलता के साथ मुस्कुराया , उपाध्याय की बाते मुझे कुछ अच्छी नही लगी तो मै थोड़ा सख्त होते हुये कहा उपाध्याय जी वो मेरी बहुत अच्छी दोस्त है और मै उसका सम्मान करता हूँ कोई भी बात या राय बनाने से पहले ये बात ध्यान मे रखिएगा, उपाध्याय अरे भाई जी आप भी हमे पता नही है क्या पर उयाध्याय की बाते और उसकी मुस्कुराहट मुझे परेशान कर रही थी उस कोचिंग के बाद शिवकुटी चला गया आशीष के कमरे मे मन मे काफी कुछ था जो परेशान कर रहा था जिसे मै ठीक से समझ नही सकता था कई बार जब मै परेशान होता था तो लगभग अंधेरा होने के बाद गंगा के किनारे चला जाता था उस दिन भी यही सोच रहा था की आशीष को साथ लेकर गंगा किनारे बैठूँगा
आशीष के कमरे मे ताला बंद था मेरी निराशा बढ़ती जा रही थी जैसे रक्तसंचार कम हो रहा हो एक तरफ लग रहा हो जैसे मै किसी बड़े गुनाह से छिपने के लिए भाग रहा हूँ, आशीष जब भी कहीं बाहर जाता हो चाभी बाहर लगे मनीप्लांट के गमले के नीचे रखी होती थी, पर जब इलाहाबाद से बाहर होता तो चाभी साथ ही ले जाता उस दिन मुझे वहाँ चाभी मिल गयी, शाम लगभग सात बजे तक कमरे मे ही आशीष का इंतज़ार करता रहा फिर एक नोट लिख कर चाभी मनीप्लांट को देकर चाय पीने के लिए निकल गया, रात मे बहुत देर तक गंगा किनारे बैठा रहा हल्की बारिश होने लगी थी वापस आने पर भी कमरे मे ताला लगा हुआ था, मनीप्लांट से चाभी लेकर जब कमरे मे गया तो नोट ठीक वैसा ही रखा था जैसा मै छोड़ कर गया था, कुछ समझ नही आ रहा था की अब कहाँ जाऊँ रात काफी हो चुकी थी कुछ देर किताबें पलटता रहा फिर वही सो गया उस रात मै ठीक से सो नही पाया तीन बार नींद मे उठा पहली बार जब किसी ने मेज मे रखा हुआ चाय का गिलास गिरा दिया शायद चूहा या और कुछ वैसा ही रहा होगा उसके बाद बहुत देर तक लाइट जला कर ये जानने की कोशिश करता रहा की गिलास जो मेज के बीच मे रखा था नीचे कैसे गिरा, एक बार फिर सोने की कोशिश कर रहा था तो चमक के साथ बादल इतनी ज़ोर से गरजे जैसे बिजली आँगन मे ही गिरी हो बारिश की तेज आवाज कमरे से साफ सुनी जा सकती थी तीसरी बार वही सुबह के चार बजे रहे होंगे नींद खुली मै पसीने से भीगा हुआ था ऐसा लग रहा था जैसे कोई सीने मे बैठ कर गला दबा रहा हो इस बार डर अपने चरम पर पहुँच गया था, फिर सो नही सका एक उमस भरी सुबह का इंतज़ार था कुछ देर बिस्तर मे ही बैठा रहा सर फट रहा था कमरे का अंधेरा डरा देने वाला लग रहा था बारिस बंद थी कमरे के बाहर नल से पानी टपकने की आवाज साफ सुनी जा सकती थी, एक नोट लिख कर मेज मे छोड़ कर चाभी मनीप्लांट को वापस दे कर निकाल आया , सुबह की चाय के लिए प्रयाग स्टेशन मे रुक गया तब तक कहीं कोई और दुकान खुली भी नही थी, मै अपने को एक दम निरुद्देश पा रहा था कुछ समझ नही आता क्या करना या क्या करना चाहता हूँ, कुछ था मन मे जिसे नकारने के लिए बस भाग रहा था, अपने आप से झूँठ बोलना आसान नही है पहली बार ऐसा लग रहा था,

अब मै चाय के लिए भी बाहर नही जाता सुबह जार्जटाउन चितरंजन के घर जाता वही पढ़ता फिर वही से कोचिंग और शाम को रूम मे ही चाय बना लेता ये सिलसिला तीन चार दिन चला उपाध्याय ने बताया की इंदुमती आई थी पूछने तो उसने बता दिया है की कुछ नोट्स बनाने है तो वहीं चितरंजन के पास जा रहे है आज कल,

अगस्त की आख़री तारीख़ गुरुवार को थी नीचे वाली आँटी जी ब्रहस्पतिदेव की पूजा कर रही थी जब इंदुमती पहली बार मेरे रूम मे आयी थी मेज खुली हुयी किताब चाय का गिलास मेज मे लुढ़क गया था नीचे बची चाय पेपर मे फैल कर सूख चुकी थी जिसमे चींटियाँ चल रही थी तौलिया दरवाजे मे स्वागत के लिए पड़ा था जूते स्टूल मे रखे हुये थे नीचे रख कर वो बैठी थी जिस तरह वो रूम मे मेरे सामने थी, मै कुछ बोल नही पा रहा था , ऐसा लगा जैसे इंटरव्यू दसवें नम्बर मे हो और नाम सबसे पहले बुला लिया हो, बिना तैयारी के एक्जाम तो देना ही था , मै लाचारी से अपनी हर चीज को देख रहा था जो बेतरीबी से फैली हुयी है, इन सब के बीच एक चीज एक परफेक्ट नज़र आ रही थी वो थी मेरी साहित्यिक किताबों की आलमारी, काफी देर दो जोड़ा खामोश आंखे कमरे मे कुछ तलाश करती रही बस वो एक दूसरे मिल नही रही थी, चाय पियोगी बोलते हुये खामोशी तोड़ते हुये बोला, इंदुमती बिना कुछ बोले ही सहमती जताई, नोट्स तैयार हो गये इंदुमती बोली, हाँ यार हो ही गये , बता कर भी तो जा सकते हो ना तुम्हें नही पता इधर कितना परेशान थी मै और तुम हर बार की तरह भाग गये इस बार भी इंदुमती और कुछ बोलती मैने पुंछा चाय मे कॉफी डाल दूँ मै ऐसे ही पीता हूँ, चाय खत्म हो गयी बहुत सी बाते जो मेरे जाने के बाद हुयी इंदुमती बताती रही और शायद कुछ बातें और भी थी जो वो बताना चाहती थी पर बताया नही, अब यह तय था की हम दोनों एक ही लॉज मे रहेंगे या कोई एसा मकान तलाश करना था जहाँ हम दोनों को रूम मिल सके, जितना उसने बताया था , उस हिसाब से इन सब की वजह मित्तल साब ही थे


मुझे घर आना था दो सितंबर को मेरा बर्थड़े था, इंदुमती चाहती थी की दो की शाम हम कहीं चले, बाद मे वो इस बात को लेकर मान गयी की मै दो को दोपहर की ट्रेन से मानिकपुर निकलूँगा और वापस आ कर कहीं घुमाने ले चलूँगा, इंदुमती की बातों मे अब कुछ अधिकारबोध लगता था जैसे वो कुछ बोले और उस बात को मानना मेरा नैतिक कर्तव्य हो, कमरे की तलाश के लिए मानिकपुर से वापस आने के बाद के लिए कहा, तब तक इंदुमती ने पराठे भी बना लिए थे, अब मुझे भी लग रहा था की हम पास होंगे तो खाने वाली समस्या भी कुछ कम ही रहेगी , खाने के बाद इंदुमती मेरी चीजों को ठीक करने की कोशिस करती रही कोचिंग का वक़्त हो गया था हम दोनों अपनी अपनी कोचिंग चले गये,
दो सितंबर 2000 की सुबह सात बजे ही इंदुमती मेरे रूम एक प्रिंटेड झोले के साथ आ गयी थी जिसमे काँच के टुकड़े जैसे सितारे लगे थे, तब तक मै भगवान को धुवे के साथ छोड़ कर बैठा पेपर पलट रहा था , अचानक से उसने मुझे हॅप्पी बर्थड़े बोलते हुये अपनी तरफ खींचा उसके नरम चेहरे को मै अपने गले के पास महशुस कर रहा था, उसने गहरे नीले रंग की खड़ी कालर वाली कमीज़ के साथ आसमानी रंग की जींस पहन रखी थी, हाँथ में कुछ पत्थरो की माला जैसी ब्रेसलेट डाली थी, ये ब्रेसलेट होटल रॉयल के बाहर लगी दुकान से मैंने ही ख़रीदा था, इंदुमती ने इसे ले तो लिया था, पर मै जनता था की वो उसे बहुत पसंद नही था, फिर भी वो उसके हाँथ में काफी अच्छा लग रहा था, उसके ब्रेसलेट को मै कंधे के पास महसूस कर सकता था, उससे "थैंक यू " बोलना चाहता पर होंठ बस कापते रहे शब्द गले से बाहर आये ही नही, और वो धीरे से मेरे कान मे कुछ फुसफुसा गयी ये सब इतना अचानक था की वो कान मे क्या बोली मै समझ नही पाया या जो समझा था उसे लेकर बात करने की हिम्मत नही हुयी, इंदुमती चाय बनाने लगी चाय रख कर वो झोले से समोसे और अमृत स्वीट हाउस की मिठाई वाला डिब्बा निकालते हुये बोली पनीर की सब्जी भी बना लाई हूँ रोटियाँ यही बना लेंगे, ट्रेन कितने बजे की है, दो बजे महानगरी से जाना है, मै बोला तो ठीक है ना मै भी चलूँगी साथ मे छोड़ने , मैंने कहा और कोचिंग कौन जाएगा , आज नही जाना यार आज तक एक भी दिन का गैप नही किया तो एक दिन चल ही जायगा,
हम स्टेशन मे थे ट्रेन आ चुकी थी इंजन आगे पीछे बदला जा रहा था, ये वही प्लेटफॉर्म था जिसे छोड़ कर हर बार जाता था पर इस बार कुछ अलग था बस इलाहाबाद से आने का मन नही हो रहा था, ट्रेन धीरे धीरे स्टेशन छोड़ रही थी बहुत दिनों बाद कोई इस तरह या पहली बार स्टेशन छोडने आया था.................
क्रमशः.............

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

                                                                      रात रजनी की विदाई 

                                                   इंदुमती  का सातवां पन्ना 


इंदुमती को छोड़ कर आगे को बढ्ने ही वाला था की इंदुमती बोली " कस मे कैसी गुड नाइट" उसके उन शब्दों मे जितनी ठंढक थी उससे कहीं ज्यादा ठंढा उसका चेहरा था एक दम बर्फ सा जमा हुआ बिना किसी भाव के जैसे भावनाओ की आंच मे पिघलना चाहता हो और उस बर्फ के ठंडे टुकड़े को कोई उत्तर के किसी ठंडे मैदान मे कोई छोड़कर जा रहा हो, पर मेरा मन कह रहा था की मै इस टुकड़े को उठा लूँ और मैंने वही किया मै चाह कर भी आगे नही जा सकता था, दिन भर की उमस के बाद जैसे संगम से ठंडे हवाओं के झोंके अल्लपुर को ठंडक दे रहे थे, मै वापस इंदुमती के करीब आ कर खड़ा हो गया पर कुछ बोला नही शायद बोलने के लिए कुछ था नही और अब मै उसे जाने के लिए कह नही सकता था, हवा के झोंके हर बार आ कर हम दोनों से कुछ कहते पर हम दोनों मे से कोई उस चुप्पी को तोड़ना नही चाहता था, मै तो उस खामोशी को हमेशा के लिए अपने पास समेट कर अपने पास रखना चाहता था, कुछ कहने के लिए इंदुमती की तरफ देखता और मुह खुलता भी तो शब्द गायब ही हो जाते इंदुमती अपने हांथ की सबसे छोटी उंगली पर पहनी हुई मोती की अंगूठी को घुमा रही थी, जैसे कोई अपराध बोध हो उसके मन मे मुझे रोकने को लेकर, या शायद कुछ कहना चाहती थी, मैंने फिर एक बार कुछ कहने की कोशिश की और जैसे ही मै बोला इंदुमती ठीक उसी के साथ ही उसने भी कुछ कहने की शुरआत की अमित,,,, मै बोला हुम्म बोलिए वो बोली तुम क्या कह रहे थे मैंने कहा मेरी छोड़ो राजकुमारी तुम बोलो, मै ये कह रही थी कि कहीं चाय नही मिलेगी क्या अब अगर एक एक चाय हो जाय तो फिर वापस घर। पर अभी चाय के लिए कहाँ जाना पड़ेगा इंदुमती बोली , प्रयाग सिविल लाइंस जंक्शन जहां बोलो वही चलते है , इंदुमती ने जंक्शन के लिए कहा तो मै बोला चलो तुम चलाओगी , तो वो बोली नही नही तुम ही चलाओ सिविल लाइंस से निरंजन के पास से निकल चलेंगे,

अब अपनी हीरोपुक सिविल लाइंस की तरफ चल दी सिविल लाइंस के कुछ ढाबे जो सड़क के किनारे बने हुये थे वहाँ ढाबे के छोटू बर्तन साफ कर रहे थे, उनके श्रम के संगीत को साफ सुना जा सकता था, ऐसे ही सैकड़ों छोटुओं का श्रम ही तो था जो सिविल लाइंस की शाम मे जान डालता है , मार्क्स भी कुछ श्रम या श्रम शक्ति जैसी ही बात किया करते थे हाँ उनकी बातों मे एक चीज और थी श्रम मूल्य शायद वो यहाँ नही था श्रम तो था पर श्रम मूल्य नही ये इलाहाबाद ही नही छोटुओं के श्रम का मूल्य कहीं नही होता वैसे मार्क्स गंभीर विषय है हम जैसों के बस की बात नही,इन छोटे तारों की चमक ज्यादा थी या आसमान मे टिमटिमाते तारों की ये सवाल मन को परेशान कर रहा था तो जब आसमान की तरफ देखा तो बस इतना याद आया की " तुम ही रात को दिन मे बदलते हो और दिन को रात मे, और तुम्ही मौत से ज़िंदगी को लाते हो और ज़िंदगी को मौत से और बिना सामर्थ्य वालों पर खुश हो जाने पर तुम्ही खुद सहारा देते हो" हे ईश्वर रहम कर इन बच्चों पर क्या यही तेरा रूप है । हम छोटुओं को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ गए और निरंजन सिनेमा होते हुये जानसनगंज से जंक्शन पहुँच गए।

छोटुवों का श्रम अभी भी मेरे कान मे चिल्ला चिल्ला कर जैसे कह रहा था की हम अपने श्रम के मूल्य मे ही जीवन बिता रहे है तब तक मेरे जीवन मे श्रम मूल्य किताबी बात ही थी इसके अनुभव को मै पूरी तरह समझ नही सका था।हम जंक्शन के पास होटल गुलाब मेंसन के बाहर सड़क की एक चाय की दुकान मे थे, इंदुमती चाय के लिए बोलने लगी दो चाय अलग से बनाना भईया थोड़ा कम शक्कर की, उस दुकान मे भी अधिकतम श्रम बच्चों का ही दिख रहा था एक बुजुर्गान एक नौजवान और पाँच छोटे बच्चे दुकान को अपने श्रम की ऊर्जा दे रहे थे, इंदुमती बोली क्या बात है इतना सन्नाटा काहे खींचे हो, कुछ नही बस यूं ही और पहली बार मार्क्स को लेकर मन मे जिज्ञासा बढ़ रही थी, इंदुमती की चाय आ गयी थी चाय अच्छी थी शायद रात के इस श्रम का परिणाम अच्छा लग रहा हो ऐसा मुझे लगा हो भी सकता है था या नही भी, इंदुमती खुश थी बार बार ऐसे बांहे फैला रही थी जैसे खुले आसमान मे उड़ना चाहती हो वो कह रही थी इस तरह आज़ादी से घूमना कितना अच्छा लगता है ना। सच मे शुक्रिया दोस्त इस चाय के लिये, मज़ा आ गया यार घड़ी देखो टाइम कितना हो रहा है , ढाई बज गया राजकुमारी अब आगे का, वो बोली अभी कुछ देर यहीं घूमते है ना फिर बाद मे चलेंगे आज घर जाने का मन नही है ।

मै इंदुमती को स्टेशन के अंदर ले गया दो प्लेटफॉर्म टिकट ली और बोला चलो राजकुमारी कुछ नया देखो तमाम चीजो को आज दूसरे नज़रिये से देख पाओगी क्यूकी ना आज कहीं जाना है ना किसी का इंतजार है, स्टेशन का व्हीलर बुक शॉप जिसमे वो लोग हमेशा भीड़ लगाते है जिन्हें किताबें लेनी ही नही है लेने वाले को पता होता है क्या लेना है वो लेकर आगे निकलता है पर जिसे वक़्त गुजरना है, बेवजह बकैती करता रहता है, कितने लोग है जो रोटी के लिये महाराष्ट्र और गुजरात दिल्ली जाने वाली गाड़ियों की जनरल बोगियों मे भूसे सा लदा हुआ जाते है । ये श्रम है जो अपना घर छोड़ कहीं और भाग रहा है और ये वही श्रम है जिससे गुजरात महाराष्ट्र दिल्ली की चमक है । पर वहाँ किसी को पता नही होगा की जो टाई बांध के वो अपने कंपनी की कामयाबी की कहानी सुनाते है उसे बनाने बाली ऊर्जा रेलवे के टायलेट मे बंद होकर पूर्बी उत्तरप्रदेश से आई है । वही कामयाबी की हकदार है। वहीं एक बूढ़े चचा प्लेटफॉर्म पर बैठे थे और ट्रेन आने पर उसके पास तक जाने के लिये लाचार थे उन्हे मैंने इंदुमती के साथ सहारा दिया उनका टिकट एसी प्रथमश्रेणी का था बेटा स्टेशन छोड़ कर चला गया था चचा बता रहे थे की एसी की टिकट थी तो बेटा बोला की आप चले जाना उसमे कहाँ भीड़ होगी, पर मै ये नही कह पाया की ट्रेन मे कैस बैठूँगा, अरे चचा छोड़ो भी मै आपको ट्रेन मे बैठाने ही तो आया था मै बोला, चचा को उनकी बर्थ मे बैठा कर हम ट्रेन से नीचे उतर रहे थे तो चचा बोले बेटा अपना नाम तो बताते जाओ और मेरा नम्बर ले लो कभी कोई काम हो तो बता देना, चचा का बेटा पुलिस मे ओहदेदार अफसर था, मैंने कहा अब रहने भी दीजिये चचा फिर नम्बर लिख ही लिया लगा की चचा को भी लगेगा की नम्बर लिखा कर उन्होने अपना ऋण चुकता कर दिया जो उस वक़्त उनकी आंखो मे साफ देखा जा सकता था । हम ट्रेन चलने तक वही प्लेटफॉर्म पर ही रहे और और फिर उन तमाम आते जाते लोगों की भागमभाग से बाहर निकाल आए,

अब हमे वापस अल्लापुर जाना था, इस बार इंदुमती हीरोपुक चला रही थी, मै सोच रहा था की कितना पैसा कितना समर्थवान आज उ चचा के पास पैसे भी थे प्रथमश्रेणी का टिकट था पर प्लेटफॉर्म से उठ कर ट्रेन मे चढ़ने का समर्थ नही था जो कुली उनके पास था वो भी ज्यादा पैसे की लालच मे उन्हे छोड़ गया था, ये पैसा फिर और ज्यादा पैसा क्या है इसका मतलब उस वक़्त एक पुरानी घटना याद आ रही थी "कहीं बाढ आई थी एक सेठ जो सोने के बहुत से गहने पहने था और ब्रेड बैंचने वाला और कुछ बच्चे बाढ मे फसे थे सभी को ज़ोरों की भूंख लगी थी सेठ ब्रेड वाले को अपने सोने के गहने दे कर ब्रेड लेना चाहता था तो ब्रेड वाले ने ये कह कर मना कर दिया की जब तक बच्चे नही खा लेते तब तक मै आपको ये ब्रेड नही दे सकता'' कई बार आपका पैसा भी आपके काम नही आता, मन काफी भारी हो रहा था, इंदुमती जब आलोपी मन्दिर के आगे जाने लगी तो मैंने कहा की कहाँ जा रहे है हम अभी भी घर नही चलना क्या, वो बोली बस बँधवा तक चलते है फिर थोड़ी देर रुक कर आ जाएंगे ।

बँधवा मे पहुँच कर हनुमान मन्दिर के थोड़ा पीछे ही किसी पंडा जी की बेंच पड़ी थी उसी मे बैठ गए गंगा, यमुना दोनों बाढ़ मे थी संगम का पानी एक ठहरी हुई झील की तरह लग रहा था, इंदुमती कह रही थी की जंक्शन से अच्छा यही आ गए होते कितनी शांति है यहाँ, अंधेरा धीर धीर कम हो रहा था मॉर्निंगवॉक वाले भी अपनी छड़ी के साथ दिखने लगे थे पूरब का आसमान गुलाबी हो रहा था यही उषा की लाली होगी, रात के सप्तर्षि के चक्र को तो अक्सर देखता था पर उषा की लाली एक लंबे समय के बाद मिल रही थी, रात रजनी की विदाई के साथ उषा की लाली के स्वागत मे इलाहब्बाद गंगा यमुना के साथ खड़ा था, उषा की लाली मे भी अपना एक अलग नशा है या यूं भी हो सकता है नशेड़ी हर जगह अपना नशा ढूंढ ही लेता है।
उषा की लाली तपन मे लाल हो इससे पहले हम घर जाते पूरी रात घूमने के बाद भी लग रहा था की अभी अंधेरा कुछ देर और रहता तो बेहतर था, इंदुमती कह रही थी कितना अजीब है ना जहां आज पानी भरा है वहाँ कुछ दिनों बाद एक नया शहर बनेगा जो सबसे अलग होता है। मैंने कहा राजकुमारी अब चलें नही कहीं ऐसा ना किसी उस शहर के बसते बसते हम उजड़ जाये, अब घर चले इंदुमती बिना कुछ बोले हीरोपुक की चाभी पकड़ा दी और हम घर के लिए चल दिये.........
क्रमशः..................

रविवार, 14 सितंबर 2014

                                                                       नॉन वेज ढाबा

                                                                 इंदुमती का छठा पन्ना 


हम सिनेमा मे जब पहुंचे तो हाल मे अंधेरा हो गया था, टार्च वाले भईया ने हमे हमारी सीट तक पहुंचाया राजकरन मे उसी समय कुछ परिवर्तन भी हुये थे । कुर्सियाँ पहले से कुछ नरम हो गयी थी आगे पीछे खिसक भी रही थी इलाहाबाद मे ये सब उपलब्धियों की तरह ही देखा जा सकता था, अब अपने को तो उ सिनेमा मे कोई इन्टरेस्ट था नही तो बस कुर्सी आगे पीछे खिसकाय रहे थे, तभी इंदुमती बोली ये कर रहे हो, तो फिर चुपचाप सीधा बैठा रहा पर मज़ा नही आ रहा था, मेरे साथ कई बार ऐसा होता था की जो फिल्म देखने का मन ना हो और कोई दोस्त ले जाय तो तो अक्सर पहले शो मे ही जाते थे और आराम से पैर फैला कर सोते थे सुबह दस से एक बजे की बिजली कटौती तो तब से आज तक चली आ रही है, फिल्म समाप्त होने के बाद सब चलने लगते तो मुझे भी उठाते और गरियाते हुये ले जाते की जब देखना नही था तो कहे पैसे खराब करने आ गए, ये फिल्म भी कुछ वैसी ही थी आगे क्या होगा ये पहले ही पता था। कहानी ऐसी थी की तीन घंटे बांध ही नही पायी, हाँ एक गीत उस समय सामयिक लगा था " उसे हसना भी होगा उसे भी रोना भी होगा हर दिल जो प्यार करेगा" पर ये उस वक़्त की अपनी एक स्थिति थी फिल्म मे एक गीत था " ऐसा पहली बार हुआ है सतरा अठरा सालों मे" तो इसी गीत के बीच मे ही मै इंदुमती से बोला मै भी अठरा का ही हूँ इंदुमती, चुप रहो मै बीस की हूँ चुपचाप फिल्म देखो इंदुमती बोली, मै बार बार बात करने की कोशिश करता और इंदुमती चुप करा देती, अब तो इंटरवेल का इंतज़ार था और वो इंतज़ार भी खत्म हुआ हाल की लाइट जल गयी कोल्ड ड्रिंक्स, समोसे वालों का आतंक चलने लगा था, जब जेब मे उधर के पैसे हों तो ये सब एक आतंक की तरह ही लगता है , इस आतंक से भी जूझते हुये कोकाकोला और चिप्स का बड़ा पैक ले लिया, कुछ फिल्मों के ट्रेलर के बाद फिल्म फिर शुरू हो गयी तब तक मै भी फिल्म मे कुछ ध्यान देने लगा था परिवार के समागम के साथ फिल्म समाप्त हुई जैसे तमाम भारतीय फिल्मों मे होता है, हाल मे रोशनी हो गयी थी लोग कुर्सियों को अकेला छोड़ कर जा रहे थे पर जैसे उनका अपना बहुत कुछ उसी सिनेमा हाल मे छूट गया हो, सबके साथ होता है शायद आपके साथ भी हुआ हो, जब तक की वो हाल की घुटन से बाहर खुले आसमान के नीचे नही आ जाता। इन्दुमती ने रुकने को कहा बोली की पहले लोगों को निकलने दो फिर चलते है ,
हम हाल के बाहर आकर सुभाष चौराहे पर खड़े थे अब खाना खाने कहाँ चलना है ,मै यही सोच रहा था तभी इन्दुमती बोली कहाँ चल रहे हो , मै बोला अब राजकुमारी बताये कहाँ चलना है , आज नॉन वेज खाने का मन है कही मस्त चिकन मिल जाए पर अब तुम बोलोगे की इन्दुमती मै चिकन नही खाता, मै कुछ बोला नही शायद कुछ सवाल अपने आप से कर रहा था, फिर बोला चलो कहाँ मिलेगा चिकन पता है वहीं चलते है , इन्दुमती बोली तुम भी कहते हो, मै बोला जब अंडे नही खाता तो चिकन कैसे पर वहां कुछ वेज होगा मै वही खा लूंगा मै खाता नही हूँ पर सामने बैठ कर कोई खाए इसमें एतराज़ भी नहीं है। हम सेन्ट्रल बैंक के सामने एक ढाबे मे सड़क किनारे खाने के लिए पहुँच गए।

मै नॉन वेज ढाबे में चला तो गया था पर मेरे मन में तमाम सवाल अब भी थे, इन्दुमती जो खाना चाह रही थी उसका इन्कार मेरे लिए किसी गुनाह से कम नही था और मै पहले कभी ऐसे किसी के साथ खाने के लिए बैठा नही था सरयूपारी गर्ग गोत्र का ब्राह्मण और मांसाहारी भोजनालय में मेरे बाबा जी को पता चलता तो शायद घर परिवार से बेदखल कर देते, फिर सोचता की ये तो प्रकृति का ही खेल है मनुष्य मांसाहार के लिए भी बना है, हमारे यहाँ पुरानी मस्जिद के पास मुल्ला फैजुल्ला रहते थे वो कहा करते थे की मनुष्य के दांतों में कैनाइन (जो कुत्तों में भी होता है) होता है, जो मांसाहार के लिए ही है , तभी तो हम मांसाहारी है, गाय कभी मांस नही खाती ना तो उसके पास वो दांत है ना हो वो मांस खा पाएगी, तो जिसे प्रकृति ने खाने के लिए बनाया तो अगर वो उसका प्रयोग करे तो क्या बुराई है। इसी सब उधेड़ बुन मे लगा था तभी इन्दुमती बोली की कुछ खाने के लिए बोलूं की कही और चले कुछ परेशानी , नही नही मै शाही पनीर रोटी लूंगा तब भी मन में था की अगर मटर पनीर बोलू तो कही नॉन वेज वाली तरी ना डाल दें, इन्दुमती ने ढाबे वाले को खाने का मीनू बता दिया अब हम खाने का इंतज़ार कर रहे थे, इन्दुमती बोली की कुछ पढ़ते भी हो की बस अमृता प्रीतम की पूजा में लगे रहते हो, सीपीएमटी इत्ता आसान नही है, इन्दुमती मुझसे दो साल सीनियर थी और एक बार सीपीएमटी की परीक्षा दे चुकी थी, मैंने कहा कर लेता हूँ, वैसे मेरा डाक्टर वाक़्टर बनने का कोई इरादा नही है, तो का बनना है कुछ तो करना है की नै इंदुमती बोली मै चुप ही रहा शायद मेरे पास कोई जवाब था नही या जो जवाब था वो मै बोलना नही चाहता था,

ढाबे वाले ने खाना लगा दिया एक ही मेज़ पर एक तरफ पनीर और दूसरी तरफ चिकन मैंने अपनी रोटी मक्खन के साथ लाने के लिए बोल दिया और इंदुमती की सादी तंदूर रोटी और खाने लगे इंदुमती चिकन के एक टुकड़े को उठा कर शायद दाँतो से छील रही थी पर मै बाद मे समझा की वो लेग पीस खा रही है ये बाद मे इंदुमती ने ही बताया था तब तक चिकन को लेकर मेरा ज्ञान शून्य था, इंदुमती ने लेग पीस को छीलते हुये जिसे वो खा रही थी बोली की पंडित जी तो हम अब अच्छे दोस्त है ना अब ये नही की तुम कल फिर गायब हो जाओ, मै बिना कुछ बोले खाने पे ही ध्यान दे रहा था खाना खाने के बाद ढाबे वाला पैसे की पर्ची लेकर आया तो मै पैसे देने लगा तो इंदुमती बोली रुको मै देती हूँ ना अब ये पाप तो ना कराओ की पंडित जी से चिकन के पैसे दिलवाए जाएँ , मै दे रही हूँ प्लीज तुम रहने दो यार फिर कभी तुम्हारी मर्जी से भी ,
खाना खा कर अब घर चलना था रात के लगभग साढ़े दस का वक़्त रहा होगा, मै बोला एक सिगरेट हो जाती तो मस्त रहता ना, हुम्म ले लो मुझे तो लेनी नही है पर सिगरेट कोई अच्छी बात नही है वो भी इस उम्र मे इंदुमती बोली, अच्छा दोहरा खा लें ठीक है जो लेना हो लो और अब चलो यहाँ से मै पान वाले के पास जा कर सिगरेट जला ही ली और और वही फूंकने लगा सिगरेट पीते ही कुछ इधर उधर की बाते होती रही तभी इंदुमती ने बताया था की उसके पापा आर्मी के रिटायर्ड अफसर है और माँ गृहणी । वो अकेली है कोई दूसरा भाई बहन नही है, मै सिगरेट फेंक कर हीरोपुक स्टार्ट करने लगा तो इंदुमती बोली पीछे खिसको जी मै चलाती हूँ।

इंदुमती के साथ वहाँ से चला ,इंदुमती कुछ बोल रही थी और मै कोई जवाब नही दे रहा था, बस यूँ ही अंदर तरह तरह के विचार उमड़ रहे थे। इंदुमती फिर कुछ बोली और सीएमपी के सामने वाले डाट पुल से हीरोपुक को बैरहना की तरफ मोड लिया तब मै इंदुमती के कंधे मे हांथ रख कर चेहरा सामने की तरफ किया मै पूछना चाहता था की इधर कहाँ अल्लापुर नहीं चलना पर कुछ पूंछ नही सका या पूंछा ही नही इंदुमती अपने गले मे शायद मेरी सांसों को महसूस कर रही थी और मै उसकी महक़ से पागल हो रहा था ऐसा लग रहा था कि अब ये कभी ना रुके चलती रहे और ऐसे ही उसी महक़ मे डूबा रहूँ, क्या है जी सो रहे हो क्या इंदुमती बोली, नही नही कहाँ चल रही हो घर नही चलना क्या मैने पूंछा तब इंदुमती बोली अभी तक नही बोले तो कुछ देर और चुप बैठे रहो, वैसे भी आज लॉज मे बता के आई हूँ की रात मे देर से आना है शायद बारह भी बज सकते है, बैरहना चौराहे के आगे इसाइयों के कब्रिस्तान के पास हीरोपुक रोक दी आम तौर पर इतनी रात को यहाँ सन्नाटा और डरावना लगता था, वैसे तब तक इंदुमती को भी नही पता था की वहाँ कब्रिस्तान है वो तो नए यमुना पुल मे काम चल रहा था वही देख रही थी, और जब मैने बताया तो बोली की चलो यहाँ से नए पुल की तरफ यहाँ रात मे भी काम होता है क्या ?

यमुना किनारे बैठ रहे यमुना का काला ठहरा हुआ पानी डरा रहा था, इंदुमती ये यमुना का पानी कितना ठहरा हुआ है और गंगा इतना तेज भागती है कि किसी के लिए वक़्त नही है और सब उसी को " माँ " कहते है जो तेज भाग रही है, इंदुमती बोली तुम भी इतना क्यो सोचते हो कभी ये नही सोचा की यमुना का ये आख़री पड़ाव है उसके बाद तो उसका अस्तित्व ही नही है। शायद इसे पता है इसका काला पानी जो गंगा से अलग है कुछ दूर बाद हमेशा के लिए खो जाएगा , और जो बनारस से इलाहाबाद कभी नही आया होगा वो कैसे जानेगा की यमुना मे कितनी गहराई थी वो तो गंगा ही जानता है ना , ये भी बेदना हो सकती है, हुम्म मै बोला पर मुझे यमुना का गंगा से प्रेम इस वेदना से कहीं अधिक लगता है । तभी तो वो अपने अस्तित्व को समाप्त कर हमेशा के लिए गंगा से मिल जाती है और उसी रंग मे खो जाती है , यही प्रेम होता है किसी मे इस तरह डूब जाओ की पता ही ना चले की तुम्हारा भी कोई अस्तित्व रहा होगा तभी संगम होता होगा, इतना कह कर मै वही लेट गया और अपना सर इंदुमती की गोद मे रख दिया, इन्दुमती मेरे माथे मे हांथ फेर रही थी और एक बार अपने होंठो को मेरे माथे के पास लाकर छोड़ दिया जैसे आँखों मे फूँक मार रही हो उसकी गरम गरम सांसे अंदर तक समा गयी और वो महक जैसे मै कभी भुला ही नही, इंदुमती मेरे बालों मे हांथ फेरते हुये बोली तुम ठीक ही कहते हो एक दूसरे मे डूबना ही संगम है, पर इस संगम मे भी एक हमेशा के लिए खो जाता है तो क्या ये प्रेम सही है , ये कैसा प्रेम है जो साथी का अस्तित्व ही समाप्त कर जाये प्रेम तो वो है जहां दोनों आसमान के तारों की तरह टिमटिमाते रहे, अमित तुम समझने की कोशिश किया करो, यमुना को गंगा मे मिल कर हमेशा के लिए इलाहाबाद मे समाप्त होना है ये उसका भाग्य है , गंगा के लिए प्रेम नही,

रात के बारह बज रहे होंगे शहर भी धीरे धीर खामोश हो रहा था, मै इंदुमती से बोला अब चलना चाहिए इस बार फिर हीरोपुक इंदुमती को ही चलाने को दे दिया और पीछे बैठ कर सोहबतियाबाग होते हुये नेताचौराहे पहुंचे और इंदुमती को उसके घर के सामने छोड़कर चलने लगा तो इंदुमती बोली अब दो को चलते है दो सितंबर को तुम्हारा बर्थड़े है ना, हुम्म तुमहे याद है मै बोला अच्छा चलो गुडनाइट कल मिलेंगे तब बात करते है , कह कर मै चलने लगा , पर सच तो ये था की मै राधा को छोड़ कर जाना ही नही चाहता था....................
क्रमशः......................

शनिवार, 6 सितंबर 2014

                                                               ध्यान से बेटा ई थ्रीजी है 

                                                               इंदुमती का पांचवां पन्ना 

सिविल लाइंस के राजकरन सिनेमा मे "हर दिल जो प्यार करेगा" देखना तय हो चुका था। सिनेमा की टिकट तो खरीदे जा सकते थे तब राजकरन का बालकनी ५१ रुपये का हुआ करता था पर उसके बाद खाना भी खाना था, इंदुमती को ना नही कह पा रहा था महीने का आखिरी समय चल रहा था, अब घर से पढ़ायी के लिये तीन से चार हजार रुपये महीने ही मिलता था,अब उसमे कमरे का किराया और बाकी के खर्च भी तो थे अब इन सबके बाद, ये सिनेमा और उसके बाद खाना खाने का प्लान मुझे परेशानी मे डाल रहा था, इंदुमती को समझाने की कोशिश भी की कि फिल्म देखने के बाद खाना खाने मे वक़्त लगेगा और लॉज वापस आने मे देर हो जाएगी, पर वो किसी तरह मानने को तैयार नही थी, उसका कहना था की अगर मुझे देर से आने मे परेशानी है तो मैटनी शो देखते है, समझ आ गया था की अब जेब खाली होगी अब जरूरत थी किसी मददगार की जो कुछ रुपए दे सके, दूसरी तरफ फिल्म देखने के लिए किसी से पैसे मांगु ये मुझे बुरा लग रहा था, अजीब परिस्थितियों में फंस गया था,
उस दिन रात भर इसी उधेड़बुन मे रहा की अब कैसे करें राधा से भी नही कह पा रहा था की पैसे नही है, यही सब सोच रहा था नींद आ नही रही थी, तो पढ़ने के लिए बैठा ही था, सामने दीपक भाई के बायो के कुछ नोट्स मेज पर रखे थे मै लेकर आया था और जल्दी ही वापस करने के लिए भी बोला था पर काफी वक़्त हो गया था दीपक मेरे ही शहर से था, दीपक के पास हीरोपुक थ्रीजी भी थी। दोनों काम बनते समझ आ रहे थे। पैसे और बाइक दोनों मिल सकती है ।
अगले दिन सबेरे ही जल्दी तैयार होकर निकला, दीपक भाई बागम्बरी गद्दी मे रहते थे, अपनी रेंजर साइकिल से बागम्बरी पहुंचे दीपक भाई अपने घर के बाहर ही खड़े थे शायद चाय पीने के लिए निकले रहे होंगे, देखते ही बोले आओ भइया आओ कैसे आना हुआ, मै शर्मिंदा था उनकी नोट्स वक़्त पे वापस करने नही गया था जो, फिर दीपक भाई बोले आओ तुम्हें चाय पिलाते है, चाय पीते पीते उन्होने दुबारा पुंछा और बताओ कैसे आना हुआ कुछ चाहिए, दीपक भाई भी मेरी आदत से खूब परचित थे मै तभी उनके पास जाता था जब कुछ काम होता था, वैसे भी वो मुझसे बड़े थे,तो उनसे बाते भी कम ही होती थी, मै चुप ही रहा कैसे बात करूँ इसी उधेड़बुन मे लगा था, चाय पीने के बाद वापस दीपक भाई के घर की तरफ चलने लगे, अब पैसे और हीरोपुक मांगनी तो थी ही, पर कैसे बोलू , पहले ही मै उनकी नोट्स महीने भर बाद वापस की है ,किसी तरह हिम्मत जुटाई और हांथ फैला ही दिये, भाई कल कुछ काम है तो आपकी गाड़ी मिल जाएगी क्या वैसे भी कल तो इतवार है, दीपक भाई मुसकुराते हुये बोले तो ये बात है तभी तो मै सोच ही रहा था की तुम आज कैसे दर्शन दे गए यार कुछ काम तो था, अच्छा कितनी देर चाहिए, मै बोला दोपहर वही एक डेढ़ बजे तक, कस मे कौनों सिनेमा जाना है का दीपक भाई ने पूछा, मै जवाब मे चुप ही रहा और अगली मांग रख दी भाई कुछ पैसे भी चाहिए घर जाना है एक दो दिन मे तो कुछ समान भी लेना है, कितना चाहिए दीपक भाई बोले पाँच सौ, ठीक है ले जाना तो पैसे अभी तो नही चाहिए, मैंने कहा नही भाई कल ही दीजिएगा । अब दीपक भाई ने आस्वास्थ कर दिया तो झूमता हुआ वापस लॉज आ कर शाम का इंतजार करने लगा ।
उयाध्याय ने आज कुछ पुरबियों को इक्ट्ठा कर रखा था, बाटी चोखा बना था, वैसे इलाहाबाद मे बाटी चोखा बनता नही था उसका तो प्रोग्राम होता था तो उसी प्रोग्राम मे हम भी शामिल हो लिए, ऐसे प्रोग्रामों की मेरी खोज जारी ही रहती थी साल मे कोई मुश्किल से २५ से ३० दिन का खाना ही मै अपने कमरे मे बनाता था, बाकी का ऐसे ही प्रोग्राम जीने का सहारा बन गए थे, उपाध्याय की बाटी खाते वक़्त तारीफ तो करनी पड़ती थी। "उपाध्याय जी बाटी तो सिर्फ आप ही बनाते है वैसे खाने के मामले मे पुरबियों का जवाब नही" बस इतना बोलते ही दो तीन दिन का खाना मुफ्त हो जाता
खाने के बाद कमरे मे किताबें पलटता रहा घड़ी मे चार बजे थे चाय पीने की इच्छा तीब्र हो रही थी चाय की दुकान अपने लिए मधुशाला जैसी ही थी उस वक़्त तक मधुशाला को लेकर अपनी सोच मे बच्चन साब की मधुशाला से मेल खाती थी चाय की दुकान मे चाय की चुस्की के साथ जगजीत सिंह की गज़ल "वो घड़ी दो घड़ी जहाँ बैठे वो जमीं महके वो शहर महके'' कुछ अलग ही मज़ा दे रही थी,गज़ल सुनते सुनते ही पास के बूकस्टॉल चला गया ये वही जगह थी जहाँ इंदुमती मुझे पहली बार मिली थी, किताबें देखते हुये अमृता प्रीतम का "कोरेकागज़" हांथ मे आ गया, कुछ देर किताब को देखता रहा फिर बंद कर दी एक डर सा आया मन मे की अगर किताब पड़ी तो कल सिनेमा नही जा पाऊँगा, बूकस्टॉल वाले से कोरेकागज़ कागज़ ले लिया और पुंछा की भइया कोई और नया तो नही जो ना पढ़ा हो और कुछ हल्का हो थोड़ा रोमांस के साथ, तो उसने लौलिता पकड़ा दी तब तक लौलिता पढ़ी नही थी पर किताब अच्छी नही है ये जरूर सुना था तभी से कुछ जिज्ञासा भी थी इसे पढ़ने की अब हांथ मे थी तो लेना ही मुनासिब लगा सोचा की देखते है क्या बुरा है इस किताब मे तब तक इंदुमती भी आ गयी थी
इन्दुमति के साथ फिर चाय की दुकान चाय पीते पीते ही कल सिनेमा जाने की योजना पर बात करने लगे और ईवनिंग शो का तय हुआ, और इंदुमती को बताया की दीपक भाई की हीरोपुक है, उसी से चलेंगे, इंदुमती बोली रिक्शे से ठीक रहता क्यु किसी दूसरे से मांगते हो रिक्शे से ही चले चलेंगे, चाय वाले को इंदुमती ने पैसे दिये और घर चल दिये तो कल शाम पाँच बजे मिलते है, कह कर इंदुमती से विदा ली, और अपने कमरे मे पहुँच गया, खाना बनाने का मन नही था तो उपाध्याय जी की तारीफ करने ही पहुँच गए, भाई उपाध्या जी आपका जवाब नही बाटी मस्त बनाते हो अब रात मे क्या खिला रहे हो, उपाध्याय भी ये सब समझने लगा था तो टपक से बोला "चोरय हो का मे" रोज़ बना बनाया पेल के सो जाते हो आज खाना है तो बर्तन धोने पड़ेंगे, मुझे भी खाना बनाने से बेहतर बर्तन धोना ही लगता था सो हाँ कर दिया, वैसे इसके सिवा कोई चारा भी नहीं था सबेरे उपाध्याय के जो भी मित्र आए थे सब खाना खा कर खिसक गए थे बेचारे को सब बर्तन अकेले ही धोने पड़े थे। रात मे खाने के बाद बर्तन धो कर, कुछ देर अपने सबजेक्ट देखता रहा और जब नींद आने लगी तो लोलिता खोल कर बैठ गया कुछ ही देर पड़ा इतनी बुरी भी नही थी जितना सब चिल्ला रहे थे चेतन भगत की किसी भी किताब से तो बेहतर ही था ये अलग बात है की चेतन भगत को मै जनता भी नही था और अब जान के जानना नही चाहता ।
अगली सुबह इतवार की थी ऐसा लग रहा था की इस सुबह का इंतज़ार मुझे बहुत लंबे वक़्त से है । काफी दिनों बाद उस दिन जल्दी ही उठ गया था, जब गाँव मे रहता था तो बाबा जी चिल्लाते थे की कभी उषा की लाली भी देखी है क्या तो उस दिन उषा की लाली देखने के लिए सबेरे ही छत पहुँच गया और बादल बेवफाई कर गए उषा की लाली तो दिखी ही नही रवि (सूरज) के भी दर्शन नही हुये निराशा के साथ काफी देर तक छत मे टहलता रहा अब इंतज़ार था तो सूरज के क्षितिज की तरफ जाने का वापस कमरे मे आकर पढ़ने लगा वही लगभग दो बजे के आस पास दीपक भाई से मिलने बगम्बरी निकाल गया।
बगम्बरी जाते वक़्त रास्ते मे कई बार मन परेशान था की अगर दीपक भाई नही मिले तो क्या करूंगा उस वक़्त मेरे पास सिर्फ २५० रुपए बचे थे अब उसमे किस तरह सिनेमा, खाना आने जाने के रिक्शे के पैसे कैसे होगा। ये सब सोच ही रहा था की दीपक भाई मिल जाये कहीं गए न हो, दीपक भाई घर मे ही मिल गए और बिना ज्यादा वक़्त लिए ही हीरोपुक की चाभी दी और बोले "ध्यान से बेटा ई थ्रीजी है" दो गियर वाली हीरोपुक ना समझना हाँ कितना रुपया चाहिए पाँच सौ मे काम चल जाएगा मै कुछ बोला नही बस पैसे और थ्रीजी लेकर निकल लिया, अब अपने चौराहे पर आकर चाय पीने लगा चाय क्या पीना था अब तो इंदुमती के आने का इंतज़ार था, चाय पी ही रहा था की इंदुमती आ गयी यही कोई पाँच सवा पाँच का वक़्त रहा होगा हम सिविल लाइंस के लिए निकल लिए।
राजकरन पहुँच कर टिकट लेने के लिए लंबी लाइन देख कर इंदुमती बोली तुम रुको मै टिकट लेती हूँ, मै टिकट के लिए पैसे निकाले तो इंदुमती बोली की मै दे रही हूँ ना तो क्यु परेशान हो, टिकट लेने के बाद शो मे काफी वक़्त था तो हम कॉफी हाउस चले गए, वही अम्बर कॉफी मे सड़क किनारे ही कुर्सी डाल कर बैठ कॉफी आने का इंतज़ार कर रहे थे इन्दुमति उस दिन सुर्ख़ लाल रंग का कुर्ता जिसमे सफ़ेद रंग की कुछ आड़ी तिरछीलाइने खिची हुई थी उसके नीचे सफ़ेद रंग की चूड़ीदार सलवार पहने थी सलवार की पैर के पंजे पर पड़ी सलवटें गोरे पैरों पर काले रंग की साधारण सी चप्पल , जालीदार सफ़ेद चुन्नी जो हवा हर बार अपने साथ उड़ा ले जाना चाहती थी बेतरीबी से बंधे बाल हर बार मांथे को चूम रहे थे, और इंदुमती हर बार उन्हे हटा कर अपने कान के पास कैद कर देती पर जैसे वो कैद मे रहना ही नही चाहते थे हर समय मांथे के साथ साथ होंठो पर भी अपनी मौजूदगी का एहसास करा जाते, इंदुमती को देख कर लग रहा था की यही सौंदर्य का चरम है, जिस तरह वो बार बार हवा मे उड़ रही अपनी चुनरी संभालती कभी अपने बालों को कान के ऊपर फंसा देती इस बेतक़्लुफ़ी के साथ भी कितना आत्म विश्वास था उसके चेहरे पर नज़र एक पल के लिए भी हटाने का मन नही कर रहा था, इतने मे कॉफी वाला कॉफी लेकर आया और मै इंदुमती के चेहरे पर ही खोया था जाने क्या ढूंढ रहा था जैसे उस दिन सब कुछ जान लेना चाहता था, इंदुमती ने कॉफी लेते हुये जैसे मुझे नींद से जगाया, मै थोड़ा झेपते हुये कॉफी पकड़ी इंदुमती बोली क्यु जी कहाँ खो जाते हो, अभी प्रीती ज़िंटा के डिम्पल देखना, मै चुप चाप कॉफी पिता रहा जैसे कोई चोर चोरी करते पकड़ा गया हो, कॉफी पीने के बाद हम राजकारन पहुंचे मैंने स्टैण्ड मे थ्रीजी खड़ी की और हॉल मे पहुंचे तो फिल्म शुरू हो चुकी थी.....................
क्रमश;..........