गुरुवार, 7 अगस्त 2014

                                                      मै अंडे नही खाता इंदुमती


राधा (मेरी इंदुमती मै उसे इंदुमती ही बुलाता था) से मुलाक़ात का दिन तो नही याद पर मै बुक स्टाल के पास अमृता प्रीतम की एक किताब हाँथ मे लेकर देख रहा था जब पहली बार मेरी इंदुमती ने मुझसे कहा ये किताब मैंने भी पड़ी है अच्छी है। उसके पहले तक राधा शायद मुझे ना जानती रही हो पर मै जनता था की वो लाज के पास वाले मित्तल साब के घर मे रहती है । मुहल्ले की लड़कियों को लेकर लड़को मे तमाम तरह की सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताए होती रहती है। उस अच्छी किताब के साथ ही इंदुमती से कुछ और देर बातें होती रही । अब अक्सर शाम को इंदुमती से मुलाक़ात होती और साथ मे ही चाय पी कर आते । जुलाई की एक शाम काफी बरिस हो रही थी। "का भइया चाय देई का जेका तुम इंतज़ार मा हो उ ना आई" भोलू चाय वाला बोला । चुप कर बे बारिश के वजह से बाइठे है पनिया निकल जाय तो चलन अऊर चाय फिर से बना बे सबेरे का काढ़ा न पेलो, बारिश धीरे धीरे कम हो रही थी मन कुछ भारी सा था जैसे कोई काम रह गया हो कुछ समझ भी नही आ रहा था । भोलू से एक "सिगरेट" मांगी दुकान खाली थी बरिस भी थी सोचा की तब तक सुलगा ही लेते है । उस समय तक सरकार ने धूम्रपान को लेकर कोई कानून नही बनाये थे पर मै हमेशा सार्वजनिक जगह पर सिगरेट पीने से बचता ही रहा, बारिश लगभग बंद ही हो गयी थी। यही कोई साड़े पाँच का वक़्त रहा होगा पर काले बादलों की वजह से लग रहा था साड़े सात बजे होंगे रूम जाने की सोच रहा था भोलू को पैसे दे कर दुकान के बाहर निकला तो इंदुमती गुलाबी रंग की छतरी लिए चली आ रही थी

तुम अभी हो मै सोच रही थी कि बारिश हो रही है तो ना आए होगे, चलो अंडे लेने है, आते ही इन्दुमति बोली, हूँ बस चाय के लिए निकला था, फिर कुछ देर बातें करते रहे उसे पीएमटी के लिए कोचिंग करनी थी उसी के बेहतर विकल्प को लेकर परेशान थी चाय पीने के बाद इंदुमती ने राजू से अंडे लिये और हम दोनों अपने अपने रूम आ गये, उस रात मै काफी परेशान था राधा को लेकर मेरे अंदर जो आकर्षण आ रहा था, उसे मै मान नही रहा था और फिर माना भी नही अगले कई दिनों तक बाहर ही नहीं निकला,

लगभग दस दिन हो गये थे बाहर निकले हुये इतवार का दिन था कहीं घूमने का मन कर रहा था । किसके साथ जाऊँ ये सवाल तब तक मुझे परेशान करता रहा है जब तक मैंने शादी नही की खैर उस वक़्त तो ये बड़ा सवाल था मेरे लिये मुझे दोस्तों की कमी हमेशा रही है, इलाहाबाद मे भी एक चितरंजन ही था जिसे दोस्त कहा जा सकता था। बाकी के तो सब उ उपाध्याय जैसे थे जो कुकर की सिटी बजी साले घुस आए कमरे मे खैर उपाध्याय की बात बाद मे करते है। तो उस दिन चितरंजन के घर पहुँच गए। घर के बाहर ही था की चितरंजन ने देखते ही कहा " कस मे जिंदा हो हम तो सोचे की मर गएव " नहीं यार थोड़ा तबीयत ठीक नही थी तभी कोचिंग भी नही आया कुछ चाय वाय भी है की बस बकैती करबों मे चितरंजन ने आवाज दी छुटकी दो चाय ले आना छुटकी प्रतापगढ़ के किसी गाँव की थी जिसे दहेज के लिये ससुराल वालों ने जला दिया था और बाद मे मायके वाले भी अपने साथ रखने को तैयार नही थे तभी चितरंजन के पिता जी जो पुलिस मे ओहदेदार थे छुटकी को अपने घर ले आये और वो इनके परिवार का एक सदस्य जैसे थी ।

चाय पीकर हम सिनेमा देखने के लिए कीटगंज विश्वामित्र पहुंचे वहाँ शाहरुख खान की जोश लगी थी अब देखना था तो देख लिया और फिल्म भी वैसी ही थी जैसा मैंने सोचा था एक इतवार और खराब कर लिया था हाँ एक गीत " हारे हारे हम तो दिल से हारे" कुछ अच्छा लगा था जो बाद मे भी मै सुना करता था । सिनेमा देखने के बाद मै चितरंजन को जार्जटाउन छोड़ कर सीधे अल्लापुर पहुंचा और भोलू की दुकान मे सिगरेट सुलगा कर बैठ गया भोलू गजल प्रेमी था सो उस वक़्त भी जगजीत सिंह की गजल "मेरी तरह तुम भी झूठे हो मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो" चल रही थी तो वही बैठा रहा भोलू बोला का भइया कहाँ रहेन उ रोज पूछय आवत है, कौन मे मैने कहा, अरे वही जिन्हे रोज चाय पियावत हौ वही और कौन भोलू की बात सुनकर ऐसा लगा जैसे कुछ सदियों से खोई हुई चीज का पता बता दिया है । साड़े चार बज रहे थे मैंने भोलू से पूंछा कितनी देर आती है, बस आवेन वाली होइहे

शाम के पाँच बज रहे थे राधा राजू से अंडे ले रही थी और मै भोलू चाय वाले की दुकान के पास खड़े उसे देख रहा था अंडे लेने के बाद राधा भोलू की दुकान की तरफ को पलटी तो मै खड़ा था। मुझे देखते ही मेरी इंदुमती ऐसे चहकी जैसे किसी बच्चे का सबसे प्यारा खोया हुवा खिलौना मिल जाय, एक बार एक दम आक्रमक होते हुये बोली कहाँ थे इतने दिन और इतना बोलने के बाद इंदुमती सामान्य होने की कोसिस करने लगी, जैसे उसे मेरे होने ना होने का कोई फर्क ही नही पड़ता, मै भी बिना इंदुमती की बात जवाब दिये भोलू को दो चाय के लिए बोल दिया और दोनों वही बाहर बेंच पर बैठ गए,भोलू ने चाय दी चाय पीते पीते इंदुमती बोली की मैंने एक या दो बार भोलू से पूंछा भी की तुम नही आए जबकि मुझे पता था की इंदुमती मुझे रोज पूछने आती थी, उसने फिर पुंछा कहाँ थे बताया नही, "कुछ तबीयत ठीक नही थी तो रूम मे ही था निकला ही नही" मै बोला। इंदुमती कहने लगी की मुझे बताना चाहिए था ना मेरे लिए खाना ही भिजवा देती, "मै अंडे नही खाता इंदुमती" वो बोली मज़ाक मत करो जब दोस्ती की है तो क्या इतना भी नही और तुम भी तो मेरी कोचिंग के लिए कितने चक्कर लगा चुके हो तब इतना तो बनता है। मैंने कहा ठीक राजकुमारी इंदुमती जी आगे से बता दूंगा वो बोली कुछ और सब्जियाँ ले लेते है तुम्हारे लिए भी बना दूँगी, इसकी जरूरत नहीं है मै ठीक हूँ और आज सुबह की सब्जी रखी होगी उसी से काम चल जाएगा

हम अपने अपने रूम आ चुके थे । मै उस रात चैन से सो सका मै आसवस्त था की अब हम दोनों अच्छे दोस्त रहेगे । आगे से कई बार राधा अपने रूम से मेरे लिए खाना बना कर देती रही
"मै कभी उस रिश्ते को समझ नही पाया राधा भी कहती थी की रिश्तों को लेकर मेरी समझ कम है "
क्रमशः

रविवार, 3 अगस्त 2014

                             इलाहाबाद में एक फ्रेण्डसिपडे मेरा भी 

साल २००० अगस्त का पहला इतवार ६ तारीख को था उसके दो दिन पहले ही राधा ने मुझे बताया था की था की ६ को अगस्त का पहला इतवार है तब मै  बोला की वो तो हर महीने आता है फिर वो गुस्से में गुलाब होती हुई बोली  हर सन्डे और इसमें फर्क है, "का फरक है में इतवार तो इतवार है के नै" मै बोला, तब मेरी इन्दुमती बोली 'मै राधा को इन्दुमती बुलाता था वो मेरे लॉज के सामने वाले घर में रहती थी मेडिकल की तैयारी  कर रही थी एक बुकस्टॉल की मुलाक़ात कब दोस्ती में  बदल गयी पता ही नही चला" हाँ तो इन्दुमती बोली की अगस्त के पहले सन्डे को फ्रेंडसिपडे होता है अब ये मत बोलना की  ये भी नही पता था। अब मै क्या बोलता की मुझे सच में नही पता था की ये कब होता है हाँ ये जरूर पता था की फ्रेंडसिपडे होता है। पर मेरे हिसाब से फरवरी में होता रहा होगा क्युकी ऐसे फालतू के दिन फरवरी में ही  होते है । अबतक राजकुमारी इन्दुमती का नया फरमान आ चुका था की सन्डे को कही जाना मत कटरा चलना है कुछ किताबें लेने और कुछ काम है उस वक़्त हम अल्लापुर नेता चौराहे के पास ही रहते थे। 

उपाध्याय जी मुझे जोर से हिला कर चिल्ला रहे थे उठो में कुम्भकरण, मै-  "का है भइया सोने दो ना आज तो इतवार है तो उपाध्याय अपनी चिर परिचित कुटिल मुस्कान के साथ बोला अरे भैयवा उ निचे बुला रही है तुम्हारी राधारानी और दस बज गया है।  मै तुरन्त उपाध्याय को झटक कर  और बालकनी में जा के निचे झाँका तो राधा तैयार खड़ी  थी। मै ऊपर से बोला बस पांच मिनट में आया उस दिन धुप नही निकली थी ठंडी हवाओं के साथ लल्लनटॉप मौसम था मै  रूम में जा के उपाध्याय को चिल्लाया हो गया अब निकलो मुझे जाना है उपाध्याय लॉज में ही मेरे बगल वाले रूम में रहता था उपाध्याय फिर कुटिलता के साथ बोला की नहाबो ना  का में तब तक मै ब्रस कर रहा था और फटाफट नहा  के जींस पहनी और टीसर्ट डालके जूते पहनते पहनते उपाध्याय को फिर चिल्लाया अब निकलबो जाना है यार उ कित्ती देर से निचे खड़ी है उपाध्याय निकलते हुए  फिर बोला हाँ उका बहुत ध्यान है और हम तो ससुरे लम्पट है ना मै  रूम में ताला बंद करके निचे पंहुचा। 

राधा मुझे उस वक़्त साक्षात लक्ष्मीबाई लग रही थी, उसने मेरे हाँथ को ट्रॉली बैग की तरह पकड़ा और खींचती हुए चल दी मै अन्दर ही अन्दर अपराधबोध में था की आज जल्दी उठ जाता तो ही ठीक था पर चलो अब जो भी होगा देखते है। हम अपने लॉज के आगे गली में आ गए थे हलकी फ़ुहार वाली बारिस भी होने लगी थी, तभी अचानक राधा मुड़ी और मेरे माथे को चूमते हुए बोलो हैप्पी फ्रेंडशिपडे सब कुछ इतना अचानक और चौकाने वाला था की मै कुछ बोल ही नही पाया राधा मुझसे सीनियर थी और हम लोग लगभग साल भर से दोस्त थे और अपनी सीमाएं  भी हमें पता थी, मै थोड़ा संभलते हुए दोनों हांथो से उसके हाँथ को पकड़ते हुए कहा सेम टू यू अब हम दोनों सामान्य थे मैंने पूंछा की कहाँ चलना है उसने कोई जवाब नही दिया और मेरा हाँथ ऐसे पकड़ लिया जैसे कोई बच्चा भीड़ में खो जाने  के डर से अपने साथ आये किसी का   हाँथ पकड़ लेता है आगे जा कर चाय की दुकान में चाय पी चाय लेने के बाद राधा बोली जल्दी चाय ख़त्म करो और कटरा चलना है आज नेतराम के यहाँ कचौड़ी खाना है बहुत जोर की भूख लगी है यार चाय का गिलास रखते  हुये मैंने चाय वाले को पैसे दिए इतने में ही एक ऑटो दिखा उस वक़्त बंधवा की तरफ आम तौर पर रिक्सा ही मिलता था कुछ किस्मत मेहरबाँ थी तो ऑटो मिल गया राधा रोज से अलग उस दिन मुझसे कुछ और करीब आकर  बैठी थी जैसे कोई बच्चा गोद में चढ़ने की कोसिस कर रहा हो मैंने उसे छेड़ते हुए कहा का बात है इन्दुमती आज बहुत प्यार आ रहा है राधा कुछ सकुचाई सी संभलने की नाकाम कोसिस करके वैसे ही बैठी रही और अपनी उँगलियाँ मेरे गले में चलाती  रही अब हम नेतराम चौराहे में थे कचौड़ियां खाते वक़्त कहने लगी अमित कोई बाइक नही मिलेगी क्या आज घूमने का मन कर रहा है। मिलेगी बिलकुल मिलेगी अब राजकुमारी कुछ मांगे और वो ना मिले लानत है बन्दे पर पास के पीसीओ से अनुराग भइया को फोन किया और भइया बोले की ले जाओ आज सन्डे है कही जाना भी नही है। 

राधा के साथ अनुराग भइया के घर पहुंचे भइया वही कटरा में ही रहते थे राधा को भैया के घर के पहले ही छोड़ दिया था जनता था की भाभी देखेंगी और बेवजह का बतंगड़, भइया बाथरूम में थे अंदर से ही बोले भाभी से चाभी ले लो शाम को जल्दी आना कुछ काम है। भाभी भी देते हुए का बात है भैया कोई लड़की वड़की तो नही घुमा रहे आज फ्रेंडशिपडे में नही भाभी आप भी सावन है तो सोचे की मनकामेश्वर होले भाभी तपाक  से बोली मै भी चलूँ, नही नही कुछ दोस्त है उन्ही के साथ जाना है कहता हुआ भागा। 

बाइक लेकर राधा के पास पहुंचा राधा इस तरह साथ होलि जैसे आगे का रास्ता उसे पता हो और अब कभी उसे बाइक से उतारना नही है। भाभी से मनकामेश्वर जाने की बात कह कर आया था तो उधर सरस्वतीघाट ही चल दिया। बालसन चौराहे  पेट्रोल लिया फिर सरस्वतीघाट के बेंच में पहुँच गए है घाट में बैठे नदी को तकते रहे एक पानी शांत था सावन में यमुना पहली बार ऐसे बहाव  में रही होगी जब आवाज नही आ रही थी  राधा ने धीरे से कहा इधर आओ मै थोड़ा खिसक के और पास होगया मै कुछ बोलता  समझता राधा ने मुझे पकड़कर अपनी तरफ खींचा और मेरा सर अपनी गोद में रख लिया और बोली की कितना अच्छा होता की अगर आदमी के सम्बन्धों में एक निश्चित दुरी बनी रहे। ये सेक्स वासना ना हो जैसे इस फूल और तितली का रिश्ता क्या ऐसा हम इंसानों  में हो सकता है । उसकी आवाज कुछ भर्राई सी थी वो बोली क्या ऐसा नही हो सकता आदमी अपने प्रेमास्पद को पास लाकर छोड़ दे उसे बांधे  न। और एक बार फिर मेरे माथे को होंठो तक लाकर छोड़ दिया उसकी गरम गरम सांसे अंदर तक बरस गयी और बोली की कुछ ऐसा हो की अपने हृदय तक खींच कर फिर हटा ले इतना कह कर राधा ने एक बार  फिर अपने बांहों में मुझे कैद कर लिया। मै उसकी धड़कनों की ख़ुश्बू में डुबकी लगाता  रहा जब अपने चेहरे पर राधा के आंशुओं को महसूस किया तो उसे अलग किया, ये क्या है इन्दुमती राजकुमारियाँ कभी रोती है क्या फिर ये गुलाम है ना तेरे साथ और कैफे में जाकर कॉफी पी और निरुद्देस बाइक दिन भर  इलाहाबाद की सड़कों में दौड़ती रही अल्फेडपार्क पत्रिकाचौरहा हॉटस्टफ पीयचक्यू सिविलाइंस और फिर वो सिविलाइन्स में ही मुझे रुकने  कह कर एक कपड़ो के शोरूम गयी जब वापस आई तो राधा के  हाँथ में एक पैकेट था। फिर हम कटरा के लिए चल दिए चार बज रहे थे। भइया को बाइक वापस करनी थी भाइय नेतराम चौराहे में ही मिल गए और मुझे आवाज दी अमीत अमीत  मै अनसुना करना चाहता था पर कर नही पाया और वही भइया  को बाइक दे दी। 

एक ख़ामोशी के साथ मै और राधा रिक्से से वापस अल्लापुर आ रहे थे हम दोनों ही अब अपने रिश्ते में परिवर्तन को समझ रहे थे जैस एक दूसरे का चेहरा देखने में संकोच हो रहा हो राधा मेरी बांह में सर  रखे हुये आँखे बंद  किये थी हमारा फ्रेंडशिपडे हो चूका था चौराहे में रिक्से से उतर कर लॉज की तरफ चल दिए और ऐसा लग रहा था जैसे राधा का और मेरा कई जन्मों का साथ छूटने वाला हो तभी राधा बोली अमित लो ये तुम्हारे लिए है। इसकी क्या जरूरत थी राधा ने अपनी बड़ी बड़ी आँखे दिखाई और मै हमेशा की तरह चुप हो गया। हैप्पी फ्रेंडशिप डे राधा बोल कर भारी  कदमो के साथ  रूम की तरफ बढ़  गए।

शनिवार, 21 जून 2014

_________मेरी भी दो मोमबत्तियां_____________

सूरज को देखे हुए कई दिन गुजर गए थे काफी ठंड थी सुबह जल्दी ही नींद खुल गयी थी बस रज़ाई की स्निग्धता मे बैठा था आज चिड़ियों की चह चाहट भी नही थी थी एक खामोशी थी परिंदे भी ठंड मे कहीं खो से गए थे और मै भी रज़ाई मे बैठे बस अपनी बिटिया को निहार रहा था, खट खट की आवाज के साथ सन्नाटे और धुंध को चीरते हुये अखबार वाले की साइकिल घर के नजदीक आ रुकी शायद इंतजार भी उसी का था 
अखबार ले कर श्रीमति जी को आवाज दी आज चाय नही दोगी क्या, जवाब भी तुरंत मिला बना लीजिये और मेरे लिए भी ले आइएगा आज क्रिसमस की छुट्टी है अभी सोने दीजिये, अब चाय की लत भी बुरी थी पीना है तो बनाना भी पड़ेगा , इतनी ठंड मे बिस्तर से निकालने का मन तो नही था पर फिर भी सोचा की रोज़ ही तो बनती है आज कूद ही बना लिजाए चाय लेकर श्रीमति जी को दी और खुद पीते हुये अखबार देखने लगा तो उसमे मीना की जलने की खबर थी मीना मेरे जानने वाले पंडित जी की बिटिया थी मेरे संस्थान मे पड़ती भी थी अभी यही कोई सात आठ महीने पहले ही तो उसकी शादी हुयी थी मै भी शादी मे गया था सब खूब खुश थे पंडित जी ने अपनी हैसियत से उठ कर दान दहेज भी दिया था बिटिया के ससुरालीजन भी सज्जन लग रहे थे दूल्हे के कुछ रिश्तेदार दहेज कम मिलने को लेकर कुछ बात जरूर कर रहे थे पर फिर भी सब कुछ ठीक ठाक ही निपट गया था और मीना को मै भी जनता था वो साहसी थी इसलिए मेरे मन मे भी संतुसती के भाव थे ,
तो आज अचानक ये सब कैसे अखबार मे लिखा था की मीना चूल्हे मे खाना बनाते वक़्त अस्सी प्रतिसत जल गयी है जब घर मे लकड़ी कंडे वाला चूल्हा था नही तो मीना उसमे कैसे जल गयी
अब जल्दी तैयार हो कर पंडित जी से फोन मे बात की तो उन्होने बताया की मेडिकल कॉलेज मे है कल सुबह ही जली थी मै भी पहुँचा तब मीना कुछ बोलने लगी थी मेरी भी बात हुयी तो वो कह रही थी की सर मैंने ही जिद की की लकड़ी के चूल्हे मे खाना बनाने की मैं अपनी गलती से खुद जल गयी हूँ , और मुझसे मेरी बेटी के बारे मे पुंछने लगी और बोली अपनी बेटी को खूब पड़ाइएगा और कभी दहेज देकर शादी करने की मत सोचिएगा अब तक मै समझ चुका था की क्या हुवा है, अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गयी और डाक्टर ने हम सबको बाहर कर दिया अब जल्दी जल्दी अस्पताल के कर्मचारी आ जा रहे थे तुरंत ही उसे दूसरे कमरे मे ले जाया गया हम लोगो बाहर ही खड़े भगवान से यही प्रार्थना कर कर रहे थे की मीना किसी तरह ठीक हो जाय कुछ देर बाद अस्पताल का एक कर्मचारी आ कर बोला की आप की बिटिया चली गयी
सब रो रहे थे मीना के ससुरली जन अस्पताल की औपचरिकताये पूरी कर रहे थे मै भी भारी कदमों के साथ घर को चल दिया क्रिसमस का दिन था रास्ते मे गिरजा घर मिला तो सोचा की दो मोमबत्तियाँ ही जला दूँ हमारे देश मे विरोध का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता था बस आज न जाने क्यूँ अपनी बिटिया को ले कर कुछ ज्यादा चिंता थी ।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

                      प्रेम और नफरत

प्रेम और नफरत दोनों जीवन के अभिन्न है। अंतर बहुत छोटा सा होता है प्रेम कब हो जाय पता नही चलता 
और नफरत कब और क्यों हुई थी  भूलता। प्रेम कब जन्म लेके पनपने लगता है ये पता ही नही चलता जितना आनन्द प्रेम में होने का है उतना ही इसे पड़ने और सुनने में आज सबेरे जब मै घर से आ रहा था तभी एक ऑटो में एक नब्बे के दशक का एक गीत सुनाई दिया " किसी को चाहते रहना कोई खता तो नही खता तो जब है  की हम हाले दिल किसी से कहे " प्रेम होता ही ऐसा है कि वो न किसी से कहा जाय और न उसके बिना रहा जाय प्रेम के बिना जीवन की कल्पना ही बेकार है। प्रेम का अपना जादू होता है। अपने तमाम रहस्यों के साथ अपनी ही कल्पनाओं और सुनहरे ख्वाबों क साथ। अपने तमाम दर्द के साथ आनंद में ही रहता है। 
     प्रेम अपने मतवाले मनोवेग से चलता जैसे दुनिया के सबसे खूबसूरत फूल उसी के पास हों वो अपने आप ही सुन्दर दिल को छूने वाले संगीत के साथ चलता है चिड़ियों चहचाहट नदियों का सुन्दर संगीत सब प्रेम के साथ ही है। प्रेम कि तमाम कवितायेँ सुरीले राग सब सुनाई देते है। इसके विपरीत नफरत में जलन और तपन से अधिक कुछ नही नफरत जहाँ भी होगी वहाँ कुछ बचता ही नही। और प्रेम में उसके सिवा कुछ होता नही 

बुधवार, 12 मार्च 2014

ब्राह्मण भूखा तो सुदामा समझा तो चाणक्य और रूठा तो रावण

ब्राह्मण भूखा तो सुदामा समझा तो चाणक्य और रूठा तो रावण
 ब्राह्मण भूखा तो सुदामा समझा तो चाणक्य और रूठा तो रावण दमदार संवाद सिनेमा में भी और उत्तर प्रदेश की राजनीती में भी यही से दिल्ली सत्ता का रास्ता निकलता है। और मेरा अनुभव है कि ब्राह्मण जिधर होता है सत्ता उसकी होती है । कोंग्रेस ,बीजेपी और बीएसपी को आप देख चुके हैं । अटल जी की खातिर ब्राह्मण बीजेपी में रहे । अटल जी के नेपथ्य में चले गए तो ब्राह्मण भाजपा से किनारा कर गए और उत्तर परदेश में बसपा के पाले में आ गए । असल बात ये है कि ब्राह्मण अकेला नहीं जाता ,उसके साथ नाई , कुम्हार ,कहार स्वछकार और लोहार आदि भी जाते हैं । इसका कारण ये है कि विभिन्न संस्कारों के अवसर पर ब्राह्मण ही इनको नेग दिलाता है इसलिए ये सभी लोग ब्राह्मण का सम्मान करते हैं और उसी के अनुसार बिना किसी के कहे वोट देते हैं । पहले मुस्लमान और ब्राह्मण एक साथ रहते थे मगर भाजपा को ये साथ पसंद नहीं आया तो उसने मंदिर और अटल जी के नाम पर उन्हें अपने पाले में कर लिया । अब फिर मुस्लमान और ब्राह्मण के साथ आने के हालात बन रहे हैं । अब देखना ये है कि कौन इन्हें अपने पाले में करता है । फ़िलहाल ब्राह्मणों के भाजपा में लौटने की सम्भावना नहीं दिख रही है । बाकी तो जो है सो हइये है।